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खुद को बेहतर बनाने के लिए सादगी का जीवन जियें : आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी ने तरुणधाम कोडरमा में भक्तों को दी देशना 


आचार्य ने अपनी दिव्य देशना में कहा कि खुद को बेहतर बनाने के लिए सादगी का जीवन जियें ना कि सादगी के जीवन को साबित करने के लिये जियें। सादगी केवल बाहरी परिधान और दिखावे का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की शैली और अपने माता-पिता गुरु जनों द्वारा दिए गए संस्कारों को बचाने की संस्कृति है। कोडरमा से पढ़िए, जैन राजकुमार अजमेरा की यह खबर…


कोडरमा। आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज श्री का नंदीश्वर पंक्ति व्रत प्रारंभ हैं। इसी कड़ी में गुरुवार को तीन दिन के उपवास के बाद चर्या के लिए उठे थे। विधि नहीं मिलने के कारण आहार चर्या नहीं हो सकी। अब तीन दिन का फिर उपवास अर्थात सात दिन के उपवास के बाद चर्या के लिए उठेंगे। राजधानी के इस विषम गर्मी के मौसम में कितना कठिन काम है। महान तपस्या गृहस्थों की सामूहिक दानांतराय प्रकृति का उदय है। आचार्य श्री प्रसन्न सागरजी महाराज एवं उपाध्याय श्री पियूष सागरजी महाराज ससंघ तरुणसागरम तीर्थ पर वर्षायोग के लिए विराजमान हैं। उनके सानिध्य में वहां विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम संपन्न हो रहे हैं।

उसी श्रृंखला में उपस्थित गुरु भक्तों को संबोधित करते हुए आचार्य ने अपनी दिव्य देशना में कहा कि खुद को बेहतर बनाने के लिए सादगी का जीवन जियें ना कि सादगी के जीवन को साबित करने के लिये जियें। सादगी केवल बाहरी परिधान और दिखावे का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की शैली और अपने माता-पिता गुरु जनों द्वारा दिए गए संस्कारों को बचाने की संस्कृति है। दिखावे की सादगी बहुत दिनों तक टिक नहीं पाती क्योंकि, सच्ची सादगी मन, वाणी और व्यवहार की पवित्रता से उपजती है।

अमर्यादित भाषा संबंधों में दूरी पैदा करती है

साधुता और तप की पहचान यही है कि शरीर, वाणी और मन के स्तर पर संयम सादगी पर संतुलन बनाए रखें। शरीर को भीतर और बाहर से शुद्ध रखना रोग मुक्त जीवन का आधार है। वाणी को मधुर और हित मित प्रियकारी बनाए रखना दूसरा सौपान है। कटु वचन किसी के लिए भी पीड़ा बन सकते हैं, बन जाते हैं और अमर्यादित भाषा संबंधों में दूरी पैदा कर देती है। इसीलिए जिसने वाणी पर संयम नहीं रखा सदा उसे उसके परिणाम भुगतने ही पड़ते हैं। वाणी से निकला कठोर शब्द तीर के समान है, जो लौट कर वापस नहीं आता।

मानसिक संतुलन की सबसे बड़ी कसौटी

मन की शांति और चेहरे की प्रसन्नता जीवन की सबसे बड़ी साधना और उपलब्धि है, जो सबसे महत्वपूर्ण है। मन को प्रसन्न, सौम्य और निर्मल रखना ही मानसिक तप साधना है। जीवन में परिस्थितियां चाहे जैसी भी हो, प्रसन्नचित रहना और छल कपट से दूर रहना सच्ची साधुता है। क्रोध और लोभ पर विजय पाना मानसिक संतुलन की सबसे बड़ी कसौटी है। ऊंचे पद और बड़ी उपलब्धियों के बाद भी जो व्यक्ति अहंकार से मुक्त और विनम्रता को अखंड बनाए रखंे, वह साधुता की कसौटी है। सादगी कोई नारा या दिखावा नहीं बल्कि आत्मा की सहज अवस्था है। यह भीतर की निर्मलता, विनम्रता और संतुलन से जन्म लेती है। जिस व्यक्ति का मन शुद्ध है, वाणी मधुर है और व्यवहार विनम्र है वही वास्तविक अर्थों में साधारण होकर भी असाधारण कहलाता है।

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