आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज ससंघ 35पिच्छी का बड़ौत धर्मनगरी में शीतकालीन प्रवास हो रहा है। यहां उनके प्रवचनों का धर्मलाभ यहां की जनता ले रही है। बड़ौत से पढ़िए, सोनल जैन की यह खबर..
बड़ौत। 11 वर्षों बाद धर्मनगरी बड़ौत में आचार्य श्री विमर्शसागर जी महामुनिराज की महामंगलमय वाणी गूंज रही है। सन् 2014 में आचार्य श्री ससंघ का चातुर्मास बड़ौत में हुआ था। बड़ौत नगर के गुरु भक्त आचार्य गुरुवर को नगर में लाने का अथक प्रयास करते रहे। दीर्घ अंतराल के बाद् आचार्य गुरुवर का पुनः आगमन धर्मनगरी बड़ौत में हुआ तो लगा मानो दीवाली ही नगर में आ गई हो। बड़ौत जैन समाज के विशेष आग्रह निवेदन पर आचार्य श्री ने बड़ौत समाज को ‘शीतकालीन प्रवास’ का मंगलमय शुभशीष प्रदान किया। मंगलवार से बड़ौत के अजितनाथ सभागार मंडी में श्री रयणसार ग्रंथ पर मंगलमय वाचना प्रारंभ हो रही है। प्रातः काल की बेला में भव्य श्रावक-श्राविकाएं गुरु आराधना पूर्वक गुरुवर की दिव्य देशना श्रवण करेंगे। मंगलवार को प्रातः काल की धर्मसभा में आचार्य श्री ने कहा जब तक बीज धरती में बोया नहीं जाता तब तक वह फल प्रदान करने में समर्थ नहीं हो सकता। बीज भूमि को देखता रहे और भूमि बीज को देखती रहे, इतने मात्र से न तो भूमि फसल प्रदान कर सकती है और नहीं बीज फल दे सकता है।
ठीक इसी प्रकार आप भगवान को मात्र देखते रहे कभी अपना समर्पण न कर सके तो भगवान को देखने मात्र से आप भगवान नहीं बन सकेंगे। भगवान बनने की पहली आवश्यकता है ‘आत्म समर्पण’ अर्थात् अब ‘मैं जो कुछ भी करूंगा वह एक मात्र जिनेन्द्र भगवान के द्वारा बतलाए मार्ग के अनुसार ही करूंगा, अपनी स्वेच्छाचार प्रवृत्ति नहीं करूंगा’ ऐसी आत्म समर्पण की भावना जहां जन्म लेती है वहीं से भगवान बनने की यात्रा प्रारंभ हो जाती है। बीज को उगाने के लिए भूमि ही पर्याप्त नहीं है, भूमि भी उर्वरा होना चाहिए। ऊसर अर्थात् बंजर भूमि में बोया गया बीज नष्ट हो जाता है। ठीक इसी प्रकार, आपकी भावनाएं श्रेष्ठ हैं।
आपका आत्म समर्पण समीचीन है किन्तु जहां आपका समर्पण है, वह पात्र श्रेष्ठ नहीं है तब भी आपको समर्पण का फल प्राप्त नहीं हो सकता। ध्यान रखो, जिन्होंने राग-द्वेष-मौह से रहित वीतरण भाव प्राप्त कर लिया हो, सर्वतता और हितोपदेशिता प्रगट कर ली हो ऐसे सच्चे। देव-जिनेंद्र देव सच्चे शास्त्र एवं सच्चे गुरु निर्गन्य वीतरागी गुरु ही वास्तव में आत्म समर्पण के लिए श्रेष्ठ आश्रय करने योग्य हों। इनकी शरण में किया गया आत्म समर्पण ही एक दिन भक्त को भगवान बना देता है।













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