रक्षा पर्व पर मुनिराजों के बंधन और उनकी आत्माराधना को भी याद किया गया। उनकी चर्या में प्राथमिकता से सहयोग देकर, उसमें तन, मन, धन, परिवार, समर्पण देकर प्रतिपल रक्षा का संकल्प लेने का आह्वान किया गया। यह पर्व अकंपनाचार्य आदि 700 मुनिराजों की रक्षा का दिवस होने से वात्सल्य पर्व कहलाता है क्या हमारा दायित्व नहीं है कि हम उन सभी मुनिराजों की, सभी संतों के उपसर्ग की पीड़ा को भी दूर करें। पढ़िए राजेश जैन दद्दू की रिपोर्ट…
इंदौर। रक्षा पर्व पर मुनिराजों के बंधन और उनकी आत्माराधना को भी याद किया गया। उनकी चर्या में प्राथमिकता से सहयोग देकर, उसमें तन, मन, धन, परिवार, समर्पण देकर प्रतिपल रक्षा का संकल्प लेने का आह्वान किया गया। यह पर्व अकंपनाचार्य आदि 700 मुनिराजों की रक्षा का दिवस होने से वात्सल्य पर्व कहलाता है क्या हमारा दायित्व नहीं है कि हम उन सभी मुनिराजों की, सभी संतों के उपसर्ग की पीड़ा को भी दूर करें, उनके दैनिक आहार, विहार, निहार में नियमित सहयोगी बने, अपने परिवार, आने वाले मेहमान, रिश्तेदारों, इष्टमित्रों को भी उसमें शामिल करें।
आहार, विहार, निहार में मुनिराजों की रक्षा अपने बच्चे जैसे करना चाहिए और उस समय सभी संतों को एक जैसा समझ कर उनकी चर्या में सहयोग करना ही रक्षापर्व है। याद कीजिए उस समय को – यही वह समय था जिस समय बलि राजा ने मुनिराजों पर घोर उपसर्ग किया था और मुनिराजों का आहार-विहार-निहार तक बंद हो गया था। क्या आपको उन पलों की याद कर सिहरन होती है.? हम तो 1 दिन बिना भोजन के बिना सुविधाओं के नहीं रह सकते और लेकिन वीतरागी मुनिश्वर सात दिवस तक इस अडिग इस उपसर्ग को सहन करते रहे। समाज को प्राथमिकता से संतों की दैनिक आवश्यकताओं (आहार, विहार, निहार) में प्राथमिकता से समर्पण करना चाहिए। अपने अन्य विकल्पों को सीमित करना चाहिए, प्रतिदिन मुनिराजों के आहार के समय के पूर्व (प्रात:8 से 11 बजे) तक हमारे नगर में किसी भी संत के चौके में है आवश्यकता की पूर्ति और समय का सहयोग करना चाहिए, रात्रि में सोने के पूर्व उन मुनिराजों आदि की वैय्यावृति करना चाहिए, उनके शुद्धि का जल है कि नहीं, उनके कमरे में अनुकूलता है कि नहीं, मच्छरों से सुरक्षा नेट आदि की व्यवस्था आदि हमारा प्रथम रक्षा विधान है और उनकी समता – दृढ़ता को नमन करना चाहिए और भावना करना चाहिए कि वीतरागी संत दिगंबर जैन शासन के वाहक दिगंबर मुनिराजों पर कभी कोई उपसर्ग ना आए।
ये मुनीश्वर निर्विघ्न आत्मसाधना करते हुए पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करें। यदि हमें उन मुनिराजों का उपसर्ग याद नहीं आता तो विचार करें कि क्या हम मुनीश्वरों के मार्ग पर चलने के योग्य है अथवा नहीं, मुनिराजों के भक्त हैं या नहीं ? यह भाई-बहन के राग का नहीं अपितु वीतरागी महामुनिराजों की अडिग साधना का स्मरण पर्व है।













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