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धर्मसभा में दिए प्रवचन : जो मेरे पास है वह संसार में सबके पास हो- निर्यापक मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज


 आज तक किसी बेटे ने प्रश्न नहीं उठाया कि मां तू मेरी सच्ची मां है कि नहीं, मां ने कह दिया कि मैं तेरी मां हूं, अरे दुनिया के कहने से क्यों मान रहा है, तू स्वयं साक्षात्कार करना। महानुभाव जब संसार के रिश्ते दूसरे के कहने पर चल रहे हैं तो परमार्थ का रिश्ता तो भगवान के कहने पर क्यों नहीं चला रहे। वहां तुम्हारी मां ने बोला है और यहां तुम्हारे गुरु बोल रहे कि भगवान महावीर हुए हैं और उनके ही अपन सब अनुयायी हुए हैं। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। पढ़िए राजीव सिंघाई की विशेष रिपोर्ट….


सागर। आज तक किसी बेटे ने प्रश्न नहीं उठाया कि मां तू मेरी सच्ची मां है कि नहीं, मां ने कह दिया कि मैं तेरी मां हूं, अरे दुनिया के कहने से क्यों मान रहा है, तू स्वयं साक्षात्कार करना। महानुभाव जब संसार के रिश्ते दूसरे के कहने पर चल रहे हैं तो परमार्थ का रिश्ता तो भगवान के कहने पर क्यों नहीं चला रहे। वहां तुम्हारी मां ने बोला है और यहां तुम्हारे गुरु बोल रहे कि भगवान महावीर हुए हैं और उनके ही अपन सब अनुयायी हुए हैं। यह बात मुनि श्री सुधासागर महाराज ने धर्म सभा में कही। उन्होंने कहा कि इसी तरह अपने अंदर अनुभव में आना चाहिए कि नहीं, जिनवाणी मां ने कहा है यही सत्य है, हमें कोई संदेह करने की जरूरत नहीं।

ये तुम्हारी मां है एक सबूत देता हूं तुम्हें, कि दुःख मुझे होता है और दुःखी ये होती है, यही मां का लक्षण है। कांटा मुझे लगता है और आंसू इसको आता है, मेरे जीवन मे दुख आये और दुःखी ये हो जाती है, बस इसके अलावा कोई लक्षण नहीं बंधुओं, यही आत्मीयता का लक्षण है। बस यही तो यहां हो रहा है, तुम लोग सब दुःख में हो और दुःखी गुरु हो रहा है, कहे सीख गुरु करुणाधार। भावना सरल है, साधना कठिन है, फिर भी लोग साधना करने को तैयार है, भावना को नहीं क्योंकि भगवान बनने के लिए भावना भानी पड़ती है कि मैं सुखी हूं, इतने से मैं सन्तुष्ट नहीं हूं, मेरा जैसा संसार सुखी हो जाये ये संतुष्टि है। मेरे पास ज्ञान है यह ज्ञानी का लक्षण नहीं है, मेरे सामान सारा जगत ज्ञानी हो जाए, ये ज्ञानी का, गुरु का लक्षण है।

दूसरों के दुख से दुखी हों

उन्होंने कहा कि मैं धनवान हूं इतनी अनुभूति हुई है तो तुम जरूरी नहीं कि अगले भव में भी धनवान होंगे। तुम्हारी अनुभूति में कभी आ जाए कि मैं धनवान हूँ, ऐसे ही सारा जगत धनवान हो जाए, बस ये रूप करना है। मुझे गरीबी पसंद नहीं है, संसार में कोई गरीब न रहे। भगवान सब तरफ से सुखी है और दुख की अनुभूति कर रहे है, वो कहते हैं कि मुझे सुख की अनुभूति तभी होगी जब सारा संसार सुखी हो जाए। अपने दुख से दुखी तो दुनिया होती है लेकिन दूसरों के दुख से जो दुखी हो जाता है, उसका नाम भगवान कहलाता है। एक नालायक वो है जो कहता है कि मैं इसके लायक नही हूँ, मैं संसार, पढ़ाई, व्यापार के लायक नहीं हूं।

दूसरा जो जिस अच्छे कार्य के करने के लायक है, फिर भी नहीं कर रहा है वो नालायक का बाप है, तुम अभिषेक, स्वाध्याय कर सकते हो, माला फेर सकते हो, तुम रात्रिभोजन त्याग कर सकते हो, तुम गुटखा, शराब त्याग कर सकते हो, फिर भी नहीं छोड़ रहे हो तो नालायक हो। तुम जैन हो, अभिषेक करने के लायक हो, फिर भी यदि भी कर रहे हो तो ये कर्म तुम्हे ऐसे कुल में पैदा करेगा, जहां तुम अभिषेक करने लायक ही नहीं रहोगे।

किसी को न आए दुख

मुनि श्री ने कहा कि जो व्यक्ति जिस बात से दुखी है वे रोते हुए मेरे पास न आवे, रोते हुए समय व्यतीत न करे, अपने दुखों को दूर करने की भावना छोड़ दें, जो जिस तरफ से दुखी है बस एक ही भावना भाए जो दुख मेरी जिंदगी में है, संसार में यह दुख किसी को न आए। गरीब लोग भावना भाए, जो गरीबी मेरी है संसार में कोई गरीब न हो, तुम अपने लिए कुछ मत मांगना। हमें कुछ नहीं चाहिए संसार सुखी चाहिए। मेरी आंख का आंसू रुके या न रुके, हमें कोई फर्क नहीं पड़ता, बस भगवन मैं किसी की आँख में आंसू देखना नहीं चाहता। आंसू लाने से नहीं, मैं आंसू देखने से दुखी हूं, ये बनते है भगवान। जो मेरे पास है वह संसार में सबके पास हो।

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