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शीतलधाम में समवसरण मंदिर की मुख्य वेदी का शिलान्यास किया : 100 फिट ऊपर डोम पर शिखर बनाया जाएगा


भगवान श्री शीतलनाथ स्वामी के समवशरण का कार्य अंतिम चरण में चल रहा है। रविवार को मुख्य वेदी का एवं 100 फिट की ऊंचाई पर डोम के ऊपर शिखर बनाने के लिये शिलान्यास किया गया। विदिशा से पढ़िए, राजीव सिंघई मोनू की यह खबर…


 विदिशा। भगवान श्री शीतलनाथ स्वामी के समवशरण का कार्य अंतिम चरण में चल रहा है। रविवार को मुख्य वेदी का एवं 100 फिट की ऊंचाई पर डोम के ऊपर शिखर बनाने के लिये शिलान्यास किया गया। नगर में विराजमान आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागरजी के शिष्य आचार्य समयसागर जी के आज्ञानुवर्ती मुनि श्री संभवसागर जी, मुनि श्री निस्सीम सागर जी, मुनि श्री संस्कार सागरजी ससंघ सानिध्य में बाल ब्र.तरुण भैया इंदौर के निर्देशन में मुंबई निवासी धर्मानुरागी गुरुभक्त परिवार प्रशांत जैन, दिव्या जैन के कर कमलों से पूर्व वित्तमंत्री जयंत मलैया एवं सुधा मलैया परिवार द्वारा संपन्न हुआ। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मंच से घोषणा की गई कि वेदी एवं शिखर का कार्य लगभग चार माह में पूर्ण हो जाएगा। इस अवसर मुनि श्री के आशीर्वाद से शीतलविहार न्यास टृस्ट के कई नये टृस्टी सदस्य बने।

उन सभी का स्वागत शीतलविहार न्यास के अध्यक्ष सचिन बसंत जैन, मंत्री मोहन जैन नमकीन कोषाध्यक्ष राजेश जैन एवं उपाध्यक्ष संजय भंडारी, रविन्द्र जैन एवं ट्रस्टियों ने किया। इस अवसर मुनि श्री ने 18 वर्ष पूर्व की स्मृतियों को ताजा करते हुए कहा कि जब 2008 में गुरुदेव के साथ इतना विशाल समवशरण जो आसमान में अपनी ऊंचाइयों को छू रहा है एवं पूर्ण होने को है। इस विशाल समवशरण मंदिर का शिलान्यास किया था और आज वह इतनी अधिक ऊंचाइयों को छू रहा है। मुनि श्री ने कहा कि कल जब अंतिम छत्र स्थापित करने ऊपर गए तो ऐसी मनोहारी कारीगरी का दृश्य था कि लगा कि हम साक्षात आरिहंत भगवान के समवसरण में ही प्रवेश कर रहे हों फिर पहली मंजिल दूसरी मंजिल तथा तीसरी मंजिल से होते हुये जब 100 फिट ऊपर डोम पर पहुंचे तो वहां से जब विदिशा को देखा तो लगा कि विदिशा बहुत छोटा हो गया है।

उस समवसरण के सामने मुनि श्री ने कहा कि हमने बहुत से स्थान पर मंदिर के ऊपर की चाबी ( छत्र) रखवाई है लेकिन वह एक पीस में हुआ करती थी लेकिन, भगवान शीतलनाथ स्वामी के समवशरण का मंदिर इतना विशाल है कि कोई भी क्रैन एक पत्थर को वहां नहीं ले जा सकती तो वहां पर आर्किटेक्ट ने चार पत्थरों का शिल्पांकन किया। जिसमें एक पत्थर का वजन नौ टन था। जिसे चार दिन के स्थान पर तीन दिनों में यह कार्य पूर्ण कर लिया। उन्होंने उन समस्त कारीगरों को आशीर्वाद देते हुए कहा कि इस समवसरण को बनाने में न जाने कितने लोगों का धन लगा होगा। धन लगाने वाले तो धन लगाते है लेकिन कल जब हमने उन कारीगरों की कारीगरी देखी तो लगा मंदिर दान से नहीं बल्कि उन कारीगर तथा मजदूरों का पसीना लगा है। मंदिर बनाने वाले सच्चे सेवक तो वही है,उन्होंने कहा कि इतनी ऊंचाई पर पत्थर का कार्य करना कोई सहज नहीं हैं, बिना समर्पण के कोई कार्य नहीं होता जरा सी चूक बहूत बड़ी समस्या को खड़ी कर सकती थी लेकिन सभी इंजीनियर आर्कीटेक्ट और कारीगरों ने सावधानी और समर्पण तथा धैर्य से अपने कार्य को पूर्ण संपादित किया जिससे आज हम सभी लोग विशिष्ट मुहुर्त में भगवान शीतलनाथ स्वामी के चार कल्याणकों से सुशोभित भद्दिलपुर भेलसा में यह कार्य संपन्न हुआ मुनि श्री ने कहा कि आज से लाखों लाखों वर्ष पूर्व जब भगवान शीतलनाथ स्वामी को इसी धरती पर केवलज्ञान हुआ तो सौधर्म इंद्र ने कुबेर को समवसरण लगाने का आदेश दिया और तत्क्षण कुवेर ने वह समवसरण की रचना कर दी जो साड़े सात योजन का था (अर्थात 75 किमी वर्गाकार एरिया) जिसमें सभी 12 सभाओं में असंख्यात देवी देवताओं के साथ असंख्यात जीव विराजमान होते थे मुनि श्री ने कहा कि आज लाखों वर्षों के पश्चात इतिहास आचार्य गुरुदेव के आशीर्वाद से पुनः दौहरा रहा है।

उन्होंने विदिशा नगर के सभी श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देते हुए कहा कि सभी घरों और परिवार के सदस्यों को मुख्य बेदी पर एक शिलाअवश्य स्थापित करना चाहिये। जिससे हजारों हजार वर्ष तक आपके परिवार को समवसरण का यह आशीर्वाद प्राप्त होता रहे। प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया इसअवसर पर सकल दि. जैन समाज के समस्त पदाधिकारी और हजारों की संख्या में भक्त धर्म श्रदालु उपस्थित थे।

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