क्षमावाणी पर्व पर आचार्य वर्धमान सागर जी ने धर्मसभा में बताया कि क्षमा मांगना सरल है लेकिन क्षमा करना कठिन है। उन्होंने शांतिसागर जी महाराज का उदाहरण देते हुए क्षमा और समता का महत्व समझाया तथा कहा कि सबसे पहले भगवान, शास्त्र, तीर्थ और गुरुजनों से क्षमा मांगनी चाहिए। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
टोंक। क्षमावाणी पर्व के अवसर पर आचार्य श्री वर्धमानसागर जी महाराज के सानिध्य में पुण्यार्जक परिवारों ने श्रीजी का अभिषेक और शांतिधारा की। धर्मसभा में उन्होंने कहा कि “मैं सबको क्षमा करता हूं”, यह वही कह सकता है जिसने क्रोध का त्याग किया हो। सभी से क्षमा मांगना सरल है लेकिन क्षमा करना कठिन है क्योंकि मानी व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकता। उन्होंने बताया कि धर्म और क्षमा छोड़ने से विवाद और न्यायालय तक की स्थिति बनती है।
प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज का राजाखेड़ा प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने समझाया कि उन पर हुए हमले के बाद भी उन्होंने हमलावरों को क्षमा किया। यह समता और क्षमा का अद्भुत उदाहरण है। आचार्य श्री ने कहा कि सबसे पहले भगवान, शास्त्र, जिनवाणी और तीर्थक्षेत्रों से क्षमा मांगनी चाहिए, फिर आचार्य और साधुओं से, और अंत में अपने आपसी विवादों को छोड़कर एक-दूसरे से क्षमा याचना करनी चाहिए।
धर्मसभा में 16 उपवासी मुनि श्री ध्येय सागर जी, 32 उपवास करने वाली श्राविका श्रीमती बाला तथा 11 उपवास करने वाले लोकेश का पारणा हुआ। मंगलवार को आचार्य श्री का आहार इंदौर के समर, संगीता और बाला परिवार के चौके में संपन्न हुआ।













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