सनावद में पर्युषण महापर्व के समापन पर युगल मुनिराज के सान्निध्य में क्षमावाणी पर्व का आयोजन किया गया। समाजजनों ने सामूहिक पूजन, ध्वजारोहण और अभिषेक के साथ भगवान के समक्ष एवं एक-दूसरे से क्षमा याचना की। मुनिराजों ने क्षमा भाव को जीवन का मूल बताया। पढ़िए सन्मति जैन काका की खास रिपोर्ट…
सनावद में पर्यूषण महापर्व यानी दशलक्षण पर्व का समापन बड़े ही हर्षोल्लास से क्षमावाणी महापर्व के रूप में किया गया। नगर में विराजमान युगल मुनिराज मुनि श्री विश्वसुर्य सागर महाराज एवं मुनि श्री साध्य सागर महाराज के सान्निध्य में सुबह श्री पार्श्वनाथ बड़ा मंदिर में सामूहिक अभिषेक पूजन हुआ। इसके बाद मंदिर के शिखरों पर केशरिया ध्वजाएं चढ़ाई गईं, जिसका सौभाग्य पवन कुमार विनीश कुमार गोधा परिवार, साधना सुनील जैन एवं निधि आशीष झाझरी ने प्राप्त किया। वहीं आदिनाथ जिनालय में ध्वजारोहण का सौभाग्य श्रीमती रेखा राकेश जैन परिवार को मिला। इस अवसर पर मुनि श्री साध्य सागर महाराज ने कहा कि भगवान महावीर ने हमें आत्म कल्याण हेतु दस धर्मों के दीपक दिए हैं। पर्युषण पर्व हमारे अंत:करण में करुणा, क्षमा और मानवता जागृत करता है। यह पर्व मन की सफाई का प्रतीक है।
रोजमर्रा की कटुता और कलुषता को त्याग जरूरी
इसी क्रम में मुनि श्री विश्वसुर्य सागर महाराज ने कहा कि जब तक मन की कटुता समाप्त नहीं होगी, क्षमावाणी पर्व का वास्तविक महत्व नहीं है। हमें रोजमर्रा की कटुता और कलुषता को त्यागकर एक-दूसरे से माफी मांगनी चाहिए। दोपहर में आदिनाथ जिनालय, सुपार्श्वनाथ मंदिर और पार्श्वनाथ बड़ा मंदिर में परंपरागत अभिषेक एवं पूजन हुए। इसके बाद सभी समाजजनों ने भगवान के समक्ष, मुनिराजों से और आपस में एक-दूसरे से क्षमा याचना की। गले मिलकर क्षमा मांगते हुए समाजजनों ने आपसी भेदभाव समाप्त कर सौहार्द और शांति का वातावरण बनाया। सनावद जैन समाज ने इस अवसर को बड़े हर्षोल्लास और भक्ति भावना के साथ मनाया।













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