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शास्त्रों से चारित्र को बनाने वाला ज्ञान मिलता है: आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने ज्ञान की विशालता का परिचय करवाया 


शनिवार सुबह आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने ज्ञान के विषय में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ज्ञान सुख को देता है और सुख का परिहार करता है। यह पूरे जीवन का प्रैक्टिकल है। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…


रामगंजमंडी। शनिवार सुबह आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज ने ज्ञान के विषय में प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ज्ञान सुख को देता है और सुख का परिहार करता है। यह पूरे जीवन का प्रैक्टिकल है। जब ज्ञान का सही उपयोग होने लगता है तो किसी को समझाने की जरूरत नहीं होती। उन्होंने कहा लोग जब स्वाध्याय करने बैठते हैं तो घडी देखते हैं लेकिन, जब टीवी देखने बैठते हैं तो घड़ी को नहीं देखते हैं। टीवी देखने से भी ज्ञान मिलता है लेकिन, टीवी देखने से मिथ्या ज्ञान मिलता है। शास्त्रों से चारित्र को बनाने वाला ज्ञान मिलता है। स्वाध्याय करते समय आत्मा के रहस्य को नहीं जाना तो मरण के समय पछताना पड़ेगा।

ज्ञान सही नहीं है, पूजन अभिषेक सही लाभ नहीं देगा

आज का किया हुआ स्वाध्याय कल भी काम आता है परसों भी काम आता है और मृत्यु के समय भी काम आता है। मृत्यु के बाद दूसरी पर्याय में भी काम आता है। आचार्यश्री ने कहा कि उन्होंने कहा अगर ज्ञान सही नहीं है, पूजन अभिषेक सही लाभ नहीं देगा। अज्ञानी से अज्ञानी व्यक्ति, अनपढ़ व्यक्ति यदि स्वाध्याय की एक लाइन पढ़ लेता है, समझ लेता है तो वह किसी न किसी भव में इसके बल से सम्यक दर्शन को प्राप्त कर लेता है।

कर्म निर्जरा में हेतु है तो वह है जिनवाणी 

आचार्यश्री ने स्वाध्याय करने की प्रेरणा देते हुए कहा कि हमें स्वाध्याय उठाना है। शास्त्र को खोलना है, पढ़ना है। सबसे ज्यादा आत्मा की कर्म निर्जरा में हेतु है तो वह जिनवाणी है। जैसे आप घर के काम घर के ढंग से व्यापार के काम व्यापार के ढंग से करते हैं। उसी प्रकार धर्म के काम भी धर्म के ढंग से करें। इस प्रकार भावों को भी भावों के तरीके से बनाओ। यह करने में हम सफल होते हैं तो लाभ ज्ञान से प्राप्त हो सकता है। इससे पूर्व मुनि श्री प्रांजल सागरजी महाराज ने भक्तामर स्तोत्र का अध्ययन कराया।

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