राग और द्वेष से कर्म बंध होते हैं। इससे सुख का नाश होता है। संसार में जन्म मरण का परिभ्रमण होता रहता है। हमें जो भौतिक पदार्थ पुरुषार्थ से मिले हैं। वह वास्तव में हमारे नहीं है नश्वर है। श्री शांतिसागर प्रवचन माला के तहत आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने कर्मबंध के बारे में बताया। टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…
टोंक। राग और द्वेष से कर्म बंध होते हैं। इससे सुख का नाश होता है। संसार में जन्म मरण का परिभ्रमण होता रहता है। हमें जो भौतिक पदार्थ पुरुषार्थ से मिले हैं। वह वास्तव में हमारे नहीं है नश्वर है। घर जिसमें आप रहते हैं। यह भी जेल के समान है। घर में रहना भी बंधन है, इन परिवार ,परिग्रह, राग द्वेष के बंधन कारण आप पराधीन है। इससे उदासीन होकर वैराग्य लेना ही वास्तविक यथार्थ ज्ञान है। यह मंगल देशना श्री शांतिसागर प्रवचन माला के तहत आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने अतिशय क्षेत्र में धर्मसभा में प्रकट की। आचार्य श्री ने श्री शांतिनाथ भगवान और प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी का संयोग बताया कि श्री शांतिनाथ भगवान के समय से धर्म परिवर्तन निरंतर चल रहा है। उसी प्रकार 20वीं सदी में प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी ने श्रमण परंपरा को परावर्तन कर पुनर्जीवित किया। तब से श्रमण परंपरा भी निर्बाध जारी है।
पुरुषार्थ करने पर मोक्ष की राह प्रशस्त होगी
आचार्य श्री ने उपदेश में आगे बताया कि प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने एक लाख वर्ष पूर्व की आयु शेष रहने पर 84 खंड के भवन राज पाठ वैभव को त्याग कर निमित्त से जैनेश्वरी दीक्षा धारण की। आप भी मन, शरीर और आत्मा रूपी तीन खंड के भवन में रहते हैं। आत्मा को सब भूल रहे हैं। आत्मा के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने का पुरुषार्थ करने पर मोक्ष की राह प्रशस्त होगी। जिनशासन ज्ञान में है। धर्म रूपी विश्व विद्यालय से ज्ञान मिलता है। शासन ज्ञान से चलता है, ज्ञान से शांति मिलती है ज्ञान नियमित बनने का मार्ग देता है। संसारी भव्य प्राणियों के लिए धर्म ही मंगलमय और शरणभूत है।
आर्यिका श्री देशना मति जी ने क्रोध और क्षमा की विवेचना की
समाज प्रवक्ता पवन कंटान और विकास जागीरदार, कमल सराफ ने बताया कि आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व आर्यिका श्री देशना मति जी ने क्रोध और क्षमा की विवेचना की। अपेक्षा की उपेक्षा होने से क्रोध आता है। पवन और अंजना सती की कहानी के माध्यम से बताया कि 22 वर्ष तक पति का वियोग सिर्फ इस कारण से हुआ कि उन्होंने जिनेंद्र भगवान की प्रतिमा को 22 मिनट के लिए छुपा दिया था। उन कर्मों के बंधन ने उन्हें यह दुःख दिया। जिसे उन्होंने समता से शांति से सहन किया। क्रोध जब बैर का रूप लेता है तो एक भव नहीं अनेक जन्मों के भव बिगड़ जाते हैं। 2 अक्टूबर को होने वाली अवनीश भाई दीक्षार्थी के परिजनों द्वारा 30 सितंबर को धार्मिक भजन का कार्यक्रम किया गया। दीक्षार्थी परिवार की ओर से प्रभावना का वितरण किया गया। रात्रि में दीक्षार्थी का हल्दी और मेंहदी का कार्यक्रम हुआ।













Add Comment