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51 वर्ष से अधिक का रहा है नाता : सजल नेत्रों से किशनगढ़ जैन समाज ने आचार्य श्री संघ को दी विदाई


श्री वर्धमान सागर जी का चालीस दिन के प्रवास दौरान पंच कल्याणक प्रतिष्ठा, 8 दिवसीय श्री भक्तामर विधान, नूतन बेदी प्रतिष्ठा, आचार्य श्री धर्म सागर स्कूल लोकार्पण मुनि दीक्षा समारोह आदि अविस्वमरणीय यादगार सफल कार्यक्रमों के पश्चात उदयपुर में पंच कल्याणक प्रतिष्ठा के लिए मंगल विहार 26 फरवरी को हुआ। पढ़िए राजेश पंचोलिया की रिपोर्ट…


मदनगंज-किशनगढ़। प्रथमाचार्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांतिसागर जी की मूल बाल ब्रह्मचारी पट्ट परम्परा के पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का चालीस दिन के प्रवास दौरान पंच कल्याणक प्रतिष्ठा, 8 दिवसीय श्री भक्तामर विधान, नूतन बेदी प्रतिष्ठा, आचार्य श्री धर्म सागर स्कूल लोकार्पण मुनि दीक्षा समारोह आदि अविस्वमरणीय यादगार सफल कार्यक्रमों के पश्चात उदयपुर में पंच कल्याणक प्रतिष्ठा के लिए मंगल विहार 26 फरवरी को हुआ। किशनगढ़ जैन समाज ही नहीं, अपितु जैनेतर समाज ने भी सजल अश्रुपूरित नेत्रों से संघ का विहार कराया। गौरव पाटनी, राजेश पंचोलिया इंदौर ने बताया कि वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी के चतुर्विद् संघ में आचार्य श्री, 8 मुनिराज, 29 आर्यिका माताजी, 2 क्षुल्लक एवं 1 क्षुल्लिका माताजी सहित 31 साधु-साध्वी हैं। इनमें 26 वर्षीय आर्यिका माताजी से लेकर 86 वर्षीय मुनिराज शामिल हैं।

किशनगढ़ से नाता

पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिघि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का मदनगंज और किशनगढ़ से 51 वर्ष से संबंध है। वर्ष 1969 में दीक्षित मुनि श्री वर्धमान सागर जी का सबसे पहले अपने दीक्षा गुरु तृतीय पट्टाधीश आचार्य श्री धर्म सागर जी के साथ वर्ष 1971 में किशनगढ़ 15 दिन से अधिक का प्रवास हुआ, तब आचार्य श्री ज्ञान सागर जी के साथ मुनि श्री विद्या सागर जी भी साथ रहे। इसके बाद वर्ष 1977 का चातुर्मास आचार्य श्री संघ के साथ किया। वर्ष 1984 में 1008 श्री मुनिसुब्रत नाथ भगवान के पंच कल्याणक के लिए दीक्षा गुरु आचार्य श्री धर्म सागर जी के साथ आए। सन 1987 में आचार्य श्री मुनि अवस्था में मुनि श्री निर्मल सागर जी के साथ आए थे, तब आपने 150 प्रतिमाओं को सूरी मंत्र भी दिया था। वर्ष 1990 में आचार्य बनने के बाद सन 1998 में आपने किशनगढ़ में चातुर्मास किया। आचार्य श्री किशनगढ़ से बस्सी गए, फिर पुन 1998 में किशनगढ़ वापस आए। वर्ष 1999 में आचार्य श्री जयपुर से किशनगढ़ संघस्थ अस्वस्थ शिष्य श्री अपूर्व सागर जी को देखने के लिए किशनगढ़ आए और किशनगढ़ समाज की बगैर मांगे मन चाही मुराद पूरी हुई और किशनगढ़ समाज को आचार्य श्री सानिध्य में महावीर जयंती मनाने का सौभाग्य मिला। पुनः वर्ष 1999 में आचार्य श्री अजमेर से किशनगढ़ आए और 7 दिन का शिविर भी आयोजित हुआ। वर्ष 2014 में आचार्य पद के 25वें वर्ष के उपलक्ष्य में रजत कीर्ति महोत्सव मनाया गया।

आचार्य श्री के चातुर्मास

आचार्य श्री ने वर्ष 1977, वर्ष 1987 में मुनि अवस्था में तथा वर्ष 1998 तथा वर्ष 2014 में आचार्य पद पर चातुर्मास किया।

पंच कल्याणक

आपने किशनगढ़ में वर्ष 1987 में और वर्ष 2015 में शिवाजी नगर मंदिर तथा श्री शांति सागर स्मारक की प्रतिष्ठा कराई।

इनकी हुई समाधि

आपके सानिध्य में 25 दिसंबर 1987 को मुनि श्री सुदर्शन सागर जी की, 10 सितंबर 1998 को आर्यिका श्री समता मति जी की, 5 मई 2015 को मुनि श्री यश सागर जी की समाधि हुई है। आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने संघ सहित अल्प प्रवास में नगर के क्षेत्रीय मंदिरों, श्री शांति स्मारक, समाधि स्थल के दर्शन किए।

दीं सात दीक्षाएं

वर्ष 2015 में आपने 7 दीक्षाएं दीं, जिनमे 1 मुनि, 4 आर्यिका तथा 2 क्षुल्लक दीक्षा रहीं। वर्ष 1971, 1977, 1984,1987,1998, 1999, 2014, 2 015 के बाद पूर्णाक 9वीं बार वर्ष 2023 में 8 वर्षो के बाद, 18 जनवरी को ऐतिहासिक भव्य मंगल प्रवेश हुआ। आपने वर्ष 2023 में किशनगढ़ में एक मुनि दीक्षा दी। 26 फरवरी को किशनगढ़ से उदयपुर में दो पंच कल्याणक के लिए विहार हो रहा है । इन 9 वर्षो में अनेक बार आचार्य श्री संघ सहित किशनगढ़ आए हैं। संभवत यह किसी भी नगर की तुलना में सर्वाधिक है।

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