दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 89वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
कबीर हमारा कोई नहीं, हम काहू के नाहिं।
पारै पहुँचे नाव ज्यों, मिलिके बिछुरी जाहिं॥
कबीरदास जी इस दोहे में जीवन की अनित्यता, संबंधों की क्षणिकता और आत्मा की स्वतंत्रता का अत्यंत गूढ़ दर्शन प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि इस संसार में न तो कोई स्थायी रूप से हमारा है और न ही हम किसी के स्थायी रूप से हैं। जो संबंध हमें अत्यंत प्रिय लगते हैं—माता, पिता, भाई, बहन, पत्नी, पुत्र, मित्र—ये सब जन्म-जन्मांतर की यात्रा में केवल एक पड़ाव मात्र हैं।
ये संबंध शरीर से जुड़े होते हैं, आत्मा से नहीं। जैसे एक नाव कुछ समय के लिए यात्रियों को साथ लेकर नदी पार कराती है और फिर वे अपने-अपने मार्ग पर निकल जाते हैं, वैसे ही जीवन में लोग कुछ समय के लिए मिलते हैं और अंततः अलग हो जाते हैं।
इस दोहे में एक मौन लेकिन गहरा संदेश छिपा है—मुक्ति का। जब तक हम यह मानते रहेंगे कि “यह मेरा है” या “मैं उसका हूं”, तब तक हम मोह में बंधे रहेंगे। मुक्ति तभी संभव है जब हम इस ‘ममत्व’—यानी “मेरा-तेरा”—की भावना को त्यागकर ‘स्व’ को पहचानें।
कबीर यहां हमें आत्मबोध की ओर उन्मुख करते हैं। मनुष्य को अपने कर्तव्यों का पालन अवश्य करना चाहिए, परन्तु उनसे बंधना नहीं चाहिए। यह संसार एक सराय की भांति है—एक अस्थायी पड़ाव, न कि अंतिम ठिकाना।
आत्मा न किसी की है, न कोई उसकी। वह परमात्मा का अंश है, और उसका उद्देश्य उसी परम स्रोत से मिलन है। सांसारिक बंधनों में उलझकर आत्मा अपने वास्तविक लक्ष्य से भटक जाती है।
यह दोहा वैराग्य की भावना उत्पन्न करता है—कि मोह, ममता और स्वामित्व की भावना से ऊपर उठो।
अतः आत्मा को चाहिए कि वह केवल ईश्वर से जुड़ाव रखे—क्योंकि वही शाश्वत है, शेष सब माया है।













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