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तपस्या करने से होती कर्मों की निर्जरा : मुनि श्री गुरुदत्त सागर जी ने समझाया तप का अर्थ


श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन बुधवार को उत्तम तप धर्म पर प्रवचन देते हुए मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी ने कहा कि तप का अर्थ इच्छाओं पर नियंत्रण रखकर शरीर, वाणी और मन को अनुशासित करते हुए आत्मा को शुद्ध करना है। महरौनी से पढ़िए, यह खबर…


महरौनी। श्री अजितनाथ दिगंबर जैन मंदिर में चल रहे दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन बुधवार को उत्तम तप धर्म पर प्रवचन देते हुए मुनि श्री गुरुदत्त सागरजी ने कहा कि तप का अर्थ इच्छाओं पर नियंत्रण रखकर शरीर, वाणी और मन को अनुशासित करते हुए आत्मा को शुद्ध करना है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति तपस्या करता है उसका मुख्य उद्देश्य आत्मा पर लगे कर्म रूपी मैल की निर्जरा करना होता है। जिस प्रकार सोना आग में तपकर शुद्ध होता है, उसी प्रकार आत्मा तप की अग्नि में तपकर अपने शुद्ध स्वरूप को प्राप्त करती है। मुनि श्री ने बताया कि जैन दर्शन में वर्णित 12 प्रकार के तप, जीव को जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त करने में सहायक हैं। इस अवसर पर मुनि श्री मेघदत्त सागर ने कहा कि इच्छा निरोधः तपः अर्थात इच्छाओं का निरोध ही तप कहलाता है लेकिन, जब तप सम्यक दर्शन और श्रद्धान के साथ किया जाता है, तब वह उत्तम तप बनता है।

उन्होंने कहा कि व्रत, उपवास, आत्म-ध्यान, स्वाध्याय, ब्रह्मचर्य और अहिंसा का पालन, सत्य बोलना, समता भाव रखना और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शांत बने रहना ही वास्तविक तप है। यह तप भौतिक सुखों के लिए नहीं बल्कि संसार के दुखों से छुटकारा पाने का उपाय है, जो केवल दुर्लभ मनुष्य जन्म में ही संभव है। देव, नारक और तिर्यंच गति में इसकी साधना संभव नहीं है। प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे और उत्तम तप धर्म के महत्व को आत्मसात किया।

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