कार्तिक माह की अष्टान्हिका पर्व पर नगर में विराजमान मुनि श्री विश्वसूर्य सागर जी महाराज एवं मुनि श्री साध्यसागर जी महाराज के सानिध्य में कर्म दहन मंडल विधान रचाया गया। जैन धर्म के अनुसार वर्ष में तीन बार अष्टान्हिका पर्व मनाया जाता है। सनावद से पढ़िए, सन्मति जैन काका की यह खबर…
सनावद। कार्तिक माह की अष्टान्हिका पर्व पर नगर में विराजमान मुनि श्री विश्वसूर्य सागर जी महाराज एवं मुनि श्री साध्यसागर जी महाराज के सानिध्य में कर्म दहन मंडल विधान रचाया गया। जैन धर्म के अनुसार वर्ष में तीन बार अष्टान्हिका पर्व मनाया जाता है। इस क्रम में कार्तिक माह की अष्टान्हिका में युगल मुनिराजों के सानिध्य में कर्म दहन मंडल विधान रचाया गया। जिसमें 148 अर्घ्य समर्पित किए गए। जैन धर्म में, कर्मदहन विधान वह पूजा-अनुष्ठान है, जिसके द्वारा आत्मा के साथ बंधे आठ प्रकार के कर्मों को जलाकर नष्ट करने का प्रयास किया जाता है।
इस विधान का अंतिम और सबसे बड़ा फल मोक्ष की प्राप्ति है। इस अवसर पर मंजुला भुंच ,ज्योतिबाला धनोते, प्रभा लश्करे, हेमलता मुंशी, मीना जटाले, राजकुमारी सराफ को विधान रचाने का अवसर प्राप्त हुआ। इस अवसर पर प्रशांत जैन, अचिंत्य जैन, संगीता पाटोदी, प्रतिभा जैन, सुनीता लश्करे, रेखा जैन, साधना मुंशी, सहित सभी समाज जन उपस्थित थे।













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