रामगंजमंडी में दशलक्षण पर्व के तीसरे दिन आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि कपट और छल का कोई भी कल्याण नहीं होता। सरल स्वभाव और आर्जव धर्म ही सच्ची संपदा है। पर्व हमें सिखा रहा है कि धर्म लक्षणों के साथ होता है। पढ़िए अभिषेक जैन लुहाड़िया की ख़ास रिपोर्ट…
रामगंजमंडी। दस लक्षण पर्व के तीसरे दिन को उत्तम आर्जव धर्म के रूप में मनाया गया। इस बेला में परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो कुछ न चाहता हो। यदि हम स्वयं से प्रश्न करें कि मैं क्या चाहता हूं तो उत्तर मिलेगा – खुशी। खुशी का एकमात्र माध्यम धर्म है जो हमारे हृदय में बसता है। आचार्य श्री ने बताया कि धर्म लक्षणों के साथ होता है। हम 355 दिन धर्म का पालन करते हैं लेकिन दस लक्षणों को भूल जाते हैं। इन लक्षणों के अभ्यास से आर्जव धर्म भी हमारे जीवन में समाहित होता है। उन्होंने कहा कि कपट करने से किसी का कल्याण नहीं होता और इससे आत्महित कभी नहीं होता।
दृष्टि से आर्जव धर्म आत्मा में बसता
आचार्य श्री ने यह भी कहा कि जितना सरल स्वभाव होगा, उतनी बहु संपदा प्राप्त होगी। यह संपदा जरूरी नहीं कि राष्ट्र से मुद्रित हो। छल और कपट का परिणाम कभी अच्छा नहीं होता। भेद विज्ञान की दृष्टि अपनाने से व्यक्ति समझ पाता है कि धन और संपत्ति उसके शरीर या आत्मा का हिस्सा नहीं हैं, और इस दृष्टि से आर्जव धर्म आत्मा में बसता है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि धर्मात्मा का हस्ताक्षर होना आवश्यक है – जो मन में है वही वचन और क्रिया में होना चाहिए। डर और मायाचारी से ही छल उत्पन्न होता है। जैन दर्शन कहता है – छिपो न छिपाओ। छल से व्यवहार बन सकता है लेकिन धर्म और आचार बिगड़ जाता है। छल का गड्ढा बहुत बड़ा है और कभी पूरी तरह भरा नहीं जा सकता।













Add Comment