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शामली में ‘जिन मुद्रा’ पर हुआ आचार्य विमर्श सागर जी का दिव्य प्रवचन : भौतिक मुद्राओं से श्रेष्ठ बताई गई ‘जिन मुद्रा’, प्रवचन में उमड़ा श्रद्धा का सागर


परम पूज्य श्रमणाचार्य आचार्य श्री विमर्श सागर जी महामुनिराज ससंघ के आगमन से शामली नगर धन्य हुआ। आयोजित प्रवचन में ‘जिन मुद्रा’ की आध्यात्मिक श्रेष्ठता पर मर्मस्पर्शी विचार रखे गए, जिसमें भौतिक मुद्राओं की सीमाओं के स्थान पर ‘जिन मुद्रा’ के अनंत मूल्य की व्याख्या की गई। पढ़िए सोनल जैन की रिपोर्ट…


शामली। परम पूज्य भावलिंगी संत श्रमणाचार्य आचार्य श्री 108 विमर्श सागर जी महामुनिराज ससंघ के आगमन से शामली नगर का वातावरण धर्ममय बन गया। नगर में आयोजित दिव्य प्रवचन में ‘जिन मुद्रा’ विषय पर आचार्य श्री जी ने अत्यंत गूढ़ किन्तु सरल उदाहरणों के माध्यम से श्रोताओं को आत्मिक चिंतन के लिए प्रेरित किया।

प्रवचन के प्रारंभ में उन्होंने एक प्रसंग सुनाया जिसमें परिवार के सदस्यों ने सबसे मूल्यवान मुद्रा पर चर्चा की। जब सभी ने डॉलर और सोने को श्रेष्ठ बताया, तब एक छोटे बालक ने कहा — “संसार की सभी मुद्राओं से अधिक मूल्यवान ‘जिन मुद्रा’ है।” इस उदाहरण के माध्यम से आचार्य श्री जी ने समझाया कि भौतिक मुद्राएँ सीमित हैं, जबकि ‘जिन मुद्रा’ तीनों लोकों में मान्य है और अनंत आध्यात्मिक संपदा की प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि मुनि, साधु और जिन आगम ही वास्तविक ‘जिन मुद्रा’ हैं, जिनसे धर्म और ज्ञान की सुगंध फैलती है। साधु भगवंतों की तुलना गेंदे के फूल से करते हुए आचार्य श्री जी ने कहा कि वे जहाँ भी जाते हैं, वहाँ धर्म की सुगंध बिखेर देते हैं।

शामली नगर में आचार्य श्री विमर्श सागर जी के आगमन को नगर का सौभाग्य बताते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि समस्त नगर, चतुर्वर्णी समाज और सभी कार्यकर्ताओं के सामूहिक पुण्य का परिणाम है। बालकों और युवाओं द्वारा की गई धर्मप्रेमी तैयारियों की विशेष सराहना की गई।

गुरु-शिष्य मिलन ‘निरग्रंथ मुद्रा’ का संगम

प्रवचन में कहा गया कि पंचम काल में जब प्रत्यक्ष प्रभु नहीं हैं, तब स्थापित जिन प्रतिमाएँ और जिन आगम ही सच्चे मार्गदर्शक हैं। जिन आगम को साधु और श्रावक – दोनों की आँख बताया गया है, जिनसे आत्मज्ञान का प्रकाश फैलता है। गुरु-शिष्य मिलन को ‘निरग्रंथ मुद्रा’ का संगम बताते हुए समाज से आह्वान किया गया कि साधु-साधु और श्रावक-साधु के मिलन को सतत बनाए रखें, जिससे जिनधर्म का ध्वज सदा ऊँचा फहराता रहे।

प्रवचन के अंत में शामली चातुर्मास आगमन को ऐतिहासिक बताया गया। कहा गया कि यह अवसर नगरवासियों के जीवन को पवित्र करने और पुण्य अर्जित करने का दुर्लभ अवसर है। आज शामली आगमन पर समस्त आचार्य संघ का सकल जैन समाज और साधु सेवा समिति द्वारा भव्य स्वागत किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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