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धरियावद में अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी के प्रवचन: जिनवाणी औषधि के समान, प्रयोग कर अपना जीवन बदला देखें

 

अशोक जेतावत | अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर जी ने कहा कि वीतराग प्रभु की वाणी को औषधि इसलिए कहा गया है क्योंकि जिनवाणी से ही मिथ्यात्व रूपी मल अपने आप गल जाता है। सत्य को स्वीकार नहीं करना सबसे बड़ा मिथ्यात्व है, जिसके वचन मधुर और स्पष्ट हो वही हमारे लिए कल्याणकारी होते हैं ।

जहां श्रद्धा है, वहां ज्ञान अपने आप आने प्रकट होने लगता है । फिर स्वाध्याय करने की भी आवश्यकता नहीं रहती है । हम किस स्थिति में हैं? कहां पर हैं? और हमें क्या करना है ? इस पर हमेशा चिंतन करना चाहिए ।

किसी भी संकट में पहले शब्द – मां या परमात्मा

हमें किसी भी संकट में मां या परमात्मा ही याद आते हैं । अन्य संसारी सगे संबंधी, मित्र-बंधु आदि कोई नहीं याद आते । जिनवचन से कितना भी क्रोधित व्यक्ति भी शांत हो जाता है। हमें हमेशा ऐसा ध्यान रखना चाहिए कि हमारे वचनों से किसी का भी नुकसान न हो, ऐसे वचन बोलने चाहिए।

किसी को भी अप्रिय और कटु वचन नहीं बोलना चाहिए। बाण का घाव भर जाता है, मगर वाणी का घाव नहीं भरता है। हम सभी को जीवन में यही संकल्प करना चाहिए कि नियमित रूप से जिनवाणी का स्वाध्याय करेंगे । चाहे वह 10 मिनट का समय भी क्यों न हो । जिनवाणी के स्वाध्याय से और कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं होता है ।

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