धर्म के सिद्धांतों, सद् गुणों, स्वभावों तथा स्वकर्तव्यों का पालन करने से जीवन सदा विकसित होगा। जैन धर्म में महिलाओं को शिक्षित, संस्कारित करने पर सबसे ज्यादा बल दिया गया है। पढ़िये अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज का विशेष आलेख…
जैन धर्म के सिद्धांतों को अंगीकार करने वाली महिलाएं आज के युग में दुराचार से दूर रहकर चहुंमुखी प्रगति कर सकती हैं। धर्म के सिद्धांतों, सद्गुणों, स्वभावों तथा स्वकर्तव्यों का पालन करने से जीवन सदा विकसित होगा। जैन धर्म में महिलाओं को शिक्षित, संस्कारित करने पर सबसे ज्यादा बल दिया गया है।
महिलाएं बनें शिक्षित
आधुनिक युग प्रतिस्पर्धा का युग है। प्रत्येक नर-नारी अपने समुचित जीवन विकास के लिए भरसक प्रयत्न करते हैं। नारी भी कंधे-से-कंधे मिलाकर अपने जीवन-साथी की कामयाबी के लिए स्वयं नौकरी करती हैं। कई बार उन्हें अपना सफर अकेले भी तय करना होता है। इसलिए ऑफिस, बस अथवा सुनसान स्थानों पर महिलाओं के साथ हो रहे दुष्कर्मों से बचने के लिए उन्हें सचेत सावधान रहना चाहिए। उन्हें जैन धर्म की पगडंडी पर कदम रखते हुए मानवीय कुविचारों से सर्वदा दूर रहना चाहिए। प्रलोभन (लालच) के बहकावे में न आकर किसी पर पुरुष के प्रति आकृष्ट होने के कुविचारों पर संयमित होना चाहिए। जैन नारी को मानवीय मूल्यों को अपनाना चाहिए। महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा शिक्षित होने का प्रयास करना चाहिए।
मानवता, सहानुभूति और आंतरिक सौंदर्य
बालिकाओं को अपने शीलव्रत का दृष्टव्य देने के लिए सती अंजना, सती सोमा, सती सीता जैसी महान नारियों की मूर्ति को अपने मन मंदिर में बनाए रखना चाहिए। अपना दृष्टिकोण हमेशा सुंदर, मधुर तथा उपादेय रखकर जीवन को सत्यं, शिवं और सुंदरम् की ओर ले जाना चाहिए। नारी में मानवता, सहानुभूति और आंतरिक सौंदर्य होना चाहिए जिसके बल पर अनैतिक आचरण को होने से रोक सकती है। जैन धर्म श्रद्धा, विवेक की पतवार से जीवन संवारकर निरंतर प्रगति के पथ पर अग्रसर होकर मानव जीवन कल्यापणमय बनती है। यर्थाथ यह है कि नदी जैसे दोनों तटों के मध्य में संतुलित होकर प्रवाहमान रहने से ही अनेक प्राणियों के लिए, जीवनदायी बन सकता है। वैसे ही मनुष्य की जीवन सरिता तादात्मय और ताटस्थ इन दोनों तटों के मध्य रहकर जीवन वीणा की शब्द लहरियों से झंकृत हो जाती है।
जैन परिवारों में कन्या जन्म हर्ष का विषय
कन्या जन्म पर दुख मनाने वाले परिवार अब जैनों में नहीं है। जैन परिवारों में तो कन्या जन्म पर हर्ष का विषय होता है। प्रत्येक नारी को अपना जीवन धर्म संस्कारों के साए में बिताना चाहिए जिससे स्वयं आत्मकल्याण के मार्ग पर चलकर दूसरों को भी राह दिखा सके। आज की बालिका, कल का भावी परिवार है अतः वे स्वयं धार्मिक सुरक्षित होकर अपने परिवार को दिशावान तथा संस्कारवान बनाकर संपूर्ण समाज, देश का नाम उन्नत करने में पूर्ण सफल होगी। भारत को नई ऊँचाइयों पर ले जाकर इसके गौरव को अक्षुण्णं रखेगी। इसके लिए उनका शिक्षित होना बहुत जरूरी है। वास्तव में जो महिलाएं सुशिक्षित हैं वे अपनी संतान को सुयोग्य साँचे में ढाल सकती हैं क्योंकि माताओं की गोद ही बच्चों के लिए प्रारंभिक पाठशाला है।
माताएं बच्चों को प्रारंभ से ही लाड़ प्यार के साथ धर्म की घूंटी पिला-पिलाकर सुसंस्कारों से हृष्ट-पुष्ट बना सकती हैं। जब बच्चे कुछ समझने और बोलने लग जायें तब उन्हें महामंत्र सिखाना, अच्छे-अच्छे धार्मिक भजनों की पंक्तियाँ रटाना, जैसे-तैसे वे 3-4 वर्ष के होते जायें उन्हें छोटी-छोटी शिक्षास्पद कथाएं सुनाना, धार्मिक पाठशालाओं में कुछ न कुछ धर्म शिक्षा दिलाते रहना ही बच्चों को सुसंस्कारित करना है। किशोरावस्था में उन्हें कुसंगति से बचाना, मंदिरों में जाने की प्रेरणा देते रहना, गुरुओं के पास ले जाना, तीर्थयात्राओं की वंदना कराते रहना उनके जीवन में सद्विचारों के बीजारोपण करना है। खासकर ग्रीष्मावकाश में बालक-बालिकाओं को गुरुओं के पास धर्म शिक्षा दिलाना, धार्मिक पढ़ाई में शिक्षण शिविरों में भाग दिलाना, छुट्टी के दिनों का बहुत बड़ा सदुपयोग है। युवकों को धर्मकथाओं के माध्यम से चारित्रवान बनाना चाहिए।
आज भी है परंपरा कायम
आज भी चन्दनबाला अनंतमती जैसी कन्याएं हैं। सीता, मैना, मनोरमा जैसी पतिव्रता हैं, चेलना जैसी कर्तव्यपरायण हैं और ब्राह्मी-सुन्दरी के पदचिन्हों पर चलने वाली आर्यिकाएं हैं। हमारी बहनों को उनसे शिक्षा लेनी चाहिए। प्रतिवर्ष एक माह नहीं तो कम से कम एक सप्ताह उनके सानिध्य में जाकर उनसे कुछ सीखना चाहिए और स्त्री समाज में बढ़ती हुई दहेज प्रथा, सहशिक्षा आदि कुरीतियों को दूर करने में अपने समय को, शक्ति को और धन को लगाना चाहिए, यही महिलाओं का कर्तव्य है।
बेटी को संस्कारों को पोटली देना जरूरी
यदि कन्या शिक्षित है तो वह जिस घर में ब्याह कर जाती है उस घर को स्वर्ग बना देती है और अपने व्यवहार से दोनों कुलों की अर्थात् पीहर तथा ससुराल दोनों का नाम रोशन करती हैं। जब तक वह पिता के घर में है अपनी मां अथवा दादी के द्वारा दी गई संस्कारों की छुट्टी से बड़ो को आदर देने वाली एवं छोटों को प्यार देने वाली होती है। शिक्षित कन्या ही ससुराल में जाकर अपने सास-ससुर का आदर कर सकती है अपने पति की सहचरी बनकर उसके हर कदम पर उसका साथ देती है। अपने ससुराल वालों को साथ और पति को हिम्मत बांधने वाली होती है। आवश्यकता पढ़ने पर साहस का परिचय देकर परिवार का गौरव बढ़ाती है और इस तरह वह दोनों कुल की लाज निभाती है। बदलती हुई परिस्थितियों में, भौतिकतावादी संस्कृति के प्रति आकर्षण बढा है जिससे धर्म के स्थान पर धन का महत्व बढ़ा है इतना ही नहीं स्वतंत्रता के मायने बदले हैं तथा उच्छृंखलता के दृश्य समाज को शर्मिदा कर रहे हैं।
पाश्चात्य सभ्यता के बढ़ते प्रभाव ने नारी सुलभ शालीनता को कठघरे में खड़ा कर दिया है। अनैतिकता के परिदृष्यों से समाज का विकृत स्वरूप सामने आ रहा है कहने का तात्पर्य यह कि जिस मर्यादित, सुसंस्कृत समाज की हमारे पूर्वजों ने कल्पना करके रीति नीति निर्धारण कर सामाजिक मानदण्ड स्थापित किये थे आज उन मानदण्डों की उपेक्षा ही नहीं बल्कि उन्हें रूढ़िवादिता कहकर नकारा जाने लगा है। परिवारों में बहू-बेटियों के बढ़ते अहंकार के चलते पारिवारिक प्रतिमान टूटते जा रहे हैं, स्वार्थ परता की भावना युवा पीढ़ी के हृदय में स्थान बनाने लगी है इस कारण उनकी नजरों में परिवार का महत्व घटने लगा है। बुजुर्गों की स्थिति दयनीय हो रही है। हमारा दायित्व है कि हम इस युवा पीढ़ी को उच्च शिक्षा के साथ मर्यादा और संस्कार का पाठ पढ़ायें परिवार, धर्म तथा जाति का महत्व समझायें, आज की बेटी कल का भविष्य है और यदि हमें अपना भविष्य सुरक्षित करना है तो अपनी बेटियों को दहेज के रूप में संस्कारों की पोटली थमाना होगी। तभी निम्न पंक्तियां सार्थक हो सकेगी।
जैन धर्म में लड़का और लड़की में कोई भेद नहीं
जैन धर्म में लड़का और लड़की में कोई भेद नहीं है। संसार की सृष्टि में स्त्री और पुरुष दो अंग हैं, जैसे-कुम्भकार के बिना चाक से बर्तन नहीं बन सकते अथवा कृषक के बिना पृथ्वी से धान्य की फसल नहीं हो सकती उसी प्रकार स्त्री पुरुष दोनों के संयोग के बिना सृष्टि की परंपरा नहीं चल सकती। आज जब घर में कन्या का जन्म होता है तब घर वाले ही क्या अड़ोस-पड़ोस के लोग भी यही सोचने लगते हैं कि यह क्या बला आ गई ? उसका मूल कारण है दहेज, इस दहेज प्रथा ने कितने अनर्थों को जन्म दिया है, सब प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रहा है। एक समय था जब कन्या को सबसे श्रेष्ठरत्न और उनके माता-पिता को सबसे श्रेष्ठ रत्नाकर माना जाता था। वास्तव में जहां एक कन्या के स्वयंवर के समय करोड़ों राजा महाराजा आकर उपस्थित होते थे और सबके मन में यही आशा रहती थी कि यह कन्या मेरे गले में वरमाला डाले। इस विषय में सुलोचना, सीता, द्रौपदी आदि के प्रत्यक्ष उदाहरण आबाल-गोपाल प्रसिद्ध ही हैं लेकिन आज सर्वथा उसके विपरीत स्थिति देखने को मिलती है। कन्याओं के जन्म को हीन दृष्टि से देखने का मूल कारण जो दहेज है, उसका कैसे निर्मूलन किया जाए ? इस पर महिलाओं को सक्रिय कदम उठाना चाहिए। महिलाएँ ही महापुरुषों की जननी हैं, तीर्थंकर जैसे नर रत्नों को भी जन्म देने का सौभाग्य महिलाओं ने ही प्राप्त किया है। यही कारण है कि महामुनियों ने भी उनकी प्रशंसा में बहुत कुछ कहा है।
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