बड़ामलहरा में ये अवसर अपने आप में अदभुत था । आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज ससंघ मलहरा में पधारे । उनके साथ 25 पिच्छीधारी संतों ने भी नगर प्रवेश किया । इस अवसर पर उपाध्यक्ष विरंजन सागर जी ने ससंघ, आगंतुक संतों की अगवानी की । श्रावक इस घटना को अपनी आंखों से देखकर आल्हादित हो गए । विस्तार से पढ़िए राजेश रागी,रत्नेश जैन की यह रिपोर्ट ।
आचार्य श्री विमर्श सागर जी का 25 से अधिक पिच्छीधारियों के साथ नगर बड़ा मलहरा में प्रवेश के समय नवोदित उपाध्याय परमेष्ठी जनसंत मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज ससंघ ने अगवानी की और दोनों संघो का परस्पर वात्सल्य मिलन हुआ। वात्सल्य मिलन के बाद बड़ा मलहरा में आचार्य श्री विमर्श सागर जी महाराज ने अपने संबोधन में कहा कि ” मनुष्य जब जन्म लेता है तो नेत्र (चक्षुओं) के साथ जन्म लेता है । जन्म के साथ जो चक्षु प्राप्त हुए हैं आपका हित में भी कारण हो सकते हैं अथवा वे नेत्र आपका अहित भी कर सकते हैं । किंतु भगवान की वाणी को सुनकर प्राणी को जो धर्म चक्षु / ज्ञान चक्षु प्राप्त होते हैं । वह मनुष्यों का हित ही करते हैं । अतः जन्म से प्राप्त हुए नेत्रों को पाकर प्राणियों को ज्ञान चक्षु धर्म चक्षु को प्राप्त करना चाहिए । ”
बड़ामलहरा में विराजित संत विमर्श सागर जी महाराज को बुंदेलखंड गौरव, भावलिंगी संत, राष्ट्रयोगी संत के रूप में जाना जाता है ।
आचार्य श्री ने धर्मसभा में कहा कि “भव भ्रमण के मार्ग अनेक हैं लेकिन भव अर्थात संसार से छूटने का मार्ग एक ही है, वह है- मोक्षमार्ग । वह मोक्षमार्ग कहां प्राप्त होगा, वह मोक्षमार्ग आपको निर्ग्रंथ वीतरागी गुरु के चरणों में ही प्राप्त होगा। आचार्य श्री ने कहा कि आप अपने कुटुंब परिवार के सदस्यों में एक ऐसे व्यक्ति को खोजना जिसने अपने मोह को जीत लिया हो। आप खोजते ही रहोगे किंतु आपको अपनों के बीच में कहीं मोह को जीतने वाला एक ही व्यक्ति नहीं मिलेगा क्योंकि आप जिनके बीच रहते हैं वे सब के सब मोही जीव हैं। इसलिए भैया मैं कहता हूं मोहमार्गी मत बनो , जिनागम मार्गी – जिनागम पंथी बनों ।”













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