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संयमित जीवन और धैर्य पर जैन संत का प्रेरक संदेश : जीवन का अधिकांश हिस्सा बुद्धि से जीते हैं, विवेक से नहीं – आचार्य प्रसन्न सागर जी


कोडरमा तरुणधाम तीर्थ पर विराजमान आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी महाराज ने प्रवचन में कहा कि जीवन में अनेक बार इंतजार करना पड़ता है, लेकिन गाड़ी ओवरटेक करते समय धैर्य खोना दुर्घटना का कारण बन जाता है। पढ़िए जैन राज कुमार अजमेरा एवं मनीष जैन सेठी की रिपोर्ट…


कोडरमा के तरुणधाम तीर्थ पर वर्षायोग हेतु विराजमान जैन संत अन्तर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज एवं उपाध्याय पियूष सागर जी महाराज ससंघ के सानिध्य में विविध धार्मिक कार्यक्रम संपन्न हो रहे हैं। इसी क्रम में आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए जीवन में विवेक और धैर्य का महत्व समझाया।

जीवन के हर चरण में इंतजार का महत्व

उन्होंने कहा कि मनुष्य जन्म लेने के लिए 9 माह मां के गर्भ में प्रतीक्षा करता है। जन्म के बाद चलने के लिए 2 वर्ष, स्कूल में प्रवेश के लिए 3 वर्ष, मतदान के लिए 18 वर्ष, शिक्षा के लिए 24 वर्ष, नौकरी के लिए 25 वर्ष और विवाह के लिए 26 से 30 वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। जीवन के हर चरण में इंतजार का महत्व है, लेकिन गाड़ी चलाते समय हम 30 सेकंड का धैर्य भी नहीं रखते और दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं। आचार्य श्री ने कहा कि कुछ क्षण की हड़बड़ी या लापरवाही जीवनभर का दुःख दे सकती है। ऐसे में घर पर प्रतीक्षा कर रहे परिजनों का भी जीवन प्रभावित होता है। इसलिए वाहन को सही रफ्तार और सही दिशा में धैर्यपूर्वक चलाना चाहिए। उन्होंने संदेश दिया – “खुद की लाइन को बड़ा करें, दूसरे की लाइन को मिटाकर छोटा करने की कोशिश न करें।”

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