मुनिश्री विलोकसागर जी के सानिध्य में श्री सिद्धचक्र विधान का कार्यक्रम जारी है। छठे दिन सिद्धों की आराधना की गई। विधिविधान से श्रद्धालुओं ने इसका पुर्ण्याजन लिया। इस मौके पर मुनिश्री विलोकसागर जी ने धर्मसभा को भी संबोधित किया। मुरैना से पढ़िए, मनोज जैन नायक की यह खबर…
मुरैना। जब हम पाषाण की प्रतिमाओं को नमन करते हैं, उनकी पूजा एवं भक्ति करते हैं, तब मन में पूर्ण आस्था होना चाहिए। आप उन्हें इस प्रकार नमन करे, आप उनकी पूजा भक्ति इस प्रकार करें जैसे आपके सामने साक्षात प्रभु विराजमान हैं। भले ही संसार के सभी अनास्था वाले व्यक्ति उसे पाषाण समझे लेकिन, आप अपने मन में आस्था रखते हुए भक्ति करना। यह उद्गार मुनिश्री विलोकसागर महाराज ने बड़ा जैन मंदिर में श्री सिद्धचक्र महामंडल विधान के छठवें दिन धर्मसभा में व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि कभी भी अपने इष्ट के प्रति अनास्था नहीं रखना चाहिए। जिनके पास आस्था है, जिनके हृदय में आस्था विराजमान है वे दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति हैं।
उनके पास अमूल्य निधि है। आस्था के साथ अपने इष्ट की आराधना, भक्ति, पूजन करोगे तो अपने आप को हटागृह से मुक्त पाओगे। मुनिश्री ने बताया कि आस्था के बिना की गई पूजा, पाठ, भक्ति व्यर्थ होती है और आस्था के साथ की गई पूजा भक्ति सार्थक होती है। इसलिए सदैव याद रखना जब भी अपने इष्ट की भक्ति करें, ये मानकर करें कि वे साक्षात् आपके सामने विराजमान हैं। अगर मन में आस्था है तो आप अपने इष्ट के सिद्धांतों को सहज स्वीकार करेंगे। अनास्था रखने वाला व्यक्ति कभी भी अपने इष्ट के सिद्धांतों को स्वीकार नहीं करता है।
ईश्वर से भले ही न डरो, लेकिन कर्म से डरो
सांसारिक प्राणी क्षण प्रतिक्षण पाप कार्यों में लिप्त रहता है। हम अनैतिक कार्य करते है और मंदिर में ईश्वर और गुरु के समक्ष जाकर उन पापों को नष्ट करने हेतु प्रार्थना करते हैं। ध्यान रखना ईश्वर आपको माफ कर सकता है, गुरु आपको माफ कर सकते हैं, लेकिन कर्म आपको कभी नहीं छोड़ेगे। कर्म तो आपको दंड देकर ही रहेंगे। यदि आपने कोई पाप किया है, तो उस पाप के परिणामों से आपको कोई नहीं बचा सकता। कर्म सदैव आपके साथ चलते हैं, जैसे आपने कर्म किए हैं उनके फलस्वरूप परिणाम तो भोगने ही होंगे। हमें कभी भी इसे कर्म या पाप नहीं करना चाहिए। जिसे ईश्वर भी माफ न कर सके। भले ही आप ईश्वर से न डरें, अपने गुरु से न डरें लेकिन कर्मों से अवश्य डरना। कर्म ही आपकी जीवन की दशा और दिशा को तय करेंगे, कर्म ही आपकी गति करेगें । इसलिए हमें सदैव सोच समझकर ही कर्म करना चाहिए। हमें अपने ईश्वर की पूजा भक्ति में लीन रहकर धार्मिक अनुष्ठान और पूजा पाठ एवं अन्य सद कार्य करते रहना चाहिए।
श्मशान जाते समय अपने ही साथ नहीं होंगे
मुनिश्री ने इस संसार के भव सागर के संदर्भ में बताते हुए कहा कि जब आपकी आयु पूरी हो जाएगी, तब आपको इस संसार को छोड़ना होगा। आपके आगे पीछे बहुत से लोगों की भीड़ होगी, जिसमें न आपका कोई शत्रु होगा, न आपका कोई मित्र होगा। सभी एक भाव के साथ आपको श्मशान की ओर ले जा रहे होगें। जरा सोचिए, विचार कीजिए, चिंतन करिए कि लोगो के लिए आपने अपना पूरा जीवन न्योछावर कर दिया, वो इस भीड़ में नहीं हैं। जिसके सुख दुःखों में नहीं था वास्ता, आज उनके कंधों पर कट रहा है रास्ता
एक दिन इस संसार से विदा होना होगा
एकबार जंगल में आग लग गई। एक व्यक्ति उस आग से बचने के लिए एक पेड़ पर चढ़ गया। पेड़ के ऊपर से वो जंगल की आग को देख रहा था। वो एक एक करके सभी पेड़ो को जलकर गिरते हुए देखकर आनंदित हो रहा था, लेकिन वो भूल गया कि थोड़ी देर में उस पेड़ के जलने की भी बारी आएगी, जिस पेड़ पर वह बैठा है। यही भूल हम सभी कर रहे हैं, इस संसार में कोई अमर होकर नहीं आया। सभी को एक न एक दिन इस संसार से विदा होना ही होगा।
मुनिराजों को धौलपुर जैन समाज ने किया श्रीफल भेंट
गुरुवार को धौलपुर जैन समाज के साधर्मी बंधुओं ने मुनिराजों के चरणों में धौलपुर आगमन के लिए श्रीफल समर्पित किया। सभी महानुभावों ने मुनिश्री से निवेदन किया कि हे! गुरुदेव आप धौलपुर नगरी में पदार्पण करें, ताकि हमें भी गुरु वाणी का लाभ प्राप्त हो सकें। श्रीफल अर्पित करते समय धौलपुर समाज के अध्यक्ष धनेश जैन, महामंत्री अमित जैन सोनू , रामभरोसी लाल जैन, उपाध्यक्ष प्रवास जैन, धर्मशाला अध्यक्ष पवनकुमार जैन, राजकुमार जैन (बर्तन फैक्ट्री), सुनीलकुमार जैन (स्टेशन मास्टर), कृष्णमोहन जैन मंत्री, राजकुमार जैन राजू (महामंत्री जैन धर्मशाला) ध्वजवाहक अनिल कुमार जैन आदि उपस्थित थे।













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