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सम्मेद शिखर : समस्याओं के कंटक पथ में समाधान की नई पगडंडियां खोजें, प्रशासन और जैन श्रावक समझें अपनी-अपनी जिम्मेदारी

सम्मेदशिखर को लेकर पूरे देश में आंदोलन चल रहा है । यह खुशी की बात है । यह इस बात का भी संकेत है की जैन समाज अपने तीर्थों को बचाने के लिए सचेत है । शिखर जी एक ऐसा तीर्थ हैं जहां से 24 तीर्थंकरों में से 20 तीर्थंकर मोक्ष गए है और उनके साथ करोड़ों मुनि भी मोक्ष को प्राप्त किए है ।

शास्त्रों में लिखा है अभी तक जितने तीर्थंकरों को मोक्ष मिला, वो शिखर जी पर ही मिला है । अनन्तानंत तीर्थंकर वहा से मोक्ष जा चुके है इसलिए सम्मेद शिखरजी एक शाश्वत तीर्थ भूमि है ।

चिंता का विषय तो यह है की जहां से अनंतानंत तीर्थंकर मोक्ष गए है वहां पर इस प्रकार का संकट आ गया है । धडल्ले से वहां पर शराब,मांस बिक रहा है , हम कुछ नहीं कर पा रहें । कहने को सरकार की ओर से प्रतिबंध है, फिर भी बिक रही है ।
सरकारी तंत्र इतना बड़ा है फिर भी एक पवित्र स्थल पर यह चल रहा है ।

इसमें यह कहना बचपना ही होगा कि सरकार,प्रशासन को पता नहीं ।

ऐसे में पूरे जैन समाज के समक्ष प्रश्न है कि आगे होगा क्या ? सही रूप में तो हमारी शक्ति और प्लानिंग पर निर्भर करता है कि आगे क्या होना है । जो अभी सम्मेद शिखरजी क्षेत्र में चल रहा है वो ही रहे या फिर आंदोलन के माध्यम से हम जैन समाज के लोग जो चाह रहे हैं, उस अनुकुल व्यवस्थाएं बदले ।

सम्मेद शिखर जी पर आगे जो कुछ होना है वो सब कुछ निर्णय, हमारी दृढ़ संकल्प शक्ति पर निर्भर करता है । दूसरी और, सरकार इसे पर्यटन स्थल घोषित करने का काम कर रही है । दोनों के अपने-अपने संकल्प, अपने-अपने फैसले…किसी का कुछ भी नहीं गया और न जाएगा …हां, मगर जाएगा तो

तीर्थ स्थान की आध्यात्मिकता जाएगी । बीते समय में जिस तरह से वहां आध्यात्मिकता का नाश हुआ है । वो सोचने पर विवश करता है कि ऐसा क्यों हुआ और क्यों होने दिया गया ।

हम केवल प्रशासन या सरकारों को दोष दें और अपने समाज में आत्ममंथन न करें, ऐसा हो नहीं सकता । अगर सरकारों ने तीर्थ की पवित्रता का ध्यान नहीं रखा तो यह भी सत्य है कि जैन संस्कार और संस्कृति दूषित हुए हैं ।

अब न तो तो आनंद आता है,न ही वह वंदना करते हुए भाव होते हैं, जो आज से कहीं वर्षों पहले होते थे । नंगे पैर के साथ पगडंडी में एक-दूसरे को पकड़ कर चलना, बिना खाए-पीए चलते रहना … पूरी वंदना में खाने-पीने के नाम पर कुछ नहीं मिलना, उस समय ऐसा अहसास होता था कि हम आध्यात्मिकता की तलाश में जा रहे हैं ।

लेकिन अब ऐसा कुछ लगता है कि हम कहीं गार्डन में घूमने जा रहे हैं । वंदना मार्ग में पवित्रता का भाव कहीं गुम हो गया है ।

शिखर जी यात्रा में जितने दिन वहां रहते थे, उतने दिन रहन-सहन ,खान-पान,बोल-चाल और भावों में भी आध्यात्मिकता दिखती थी। मगर अब कुछ ऐसा नहीं लगता । शिखर जी को लेकर केन्द्र सरकार, राज्य सरकार के पाले में गेंद डाली जा रही है और हम यही देखने में उलझे हुए हैं कि वास्तव में सबसे पहले उझारी किसने थी और उसे पकड़ी किसने थी ।

जो समाज जगा तो फिर से शिखर जी के नाम पर आरोपों की गेंद, हम एक-दुसरे पर फेंक रहे हैं ।
इन सब में हम उलझ गए है कि वास्तव में हम अपनी बात किसके पास रखें, समझ में ही नहीं आ रहा । पहले यह निर्णय हो जाए की वास्तव में हमारी बात का समाधान कौन करेगा ? जहां समाधान हो, वहीं हम जाकर अपनी बात को रखें ।

अब बहुत हुआ, भारत के करीब करीब हर शहर में किसी ना किसी रूप में आंदोलन हो चुका । अब आरोपों की गेंद एक-दूसरे के पाले में डालने की बजाए एक बात और एक स्थान तय करें । भारत के हर एक जैन घर का प्रतिनिधि तय स्थान पर पहुंच कर अपनी बात रखें तो सरकार गेंद उछालना बंद करेगी और निर्णय भी होगा ।

यह तो पक्का है जब गजट पास हुआ था उस समय दोनों सरकार की रजामंदी से ही हुआ होगा । इन अब बातों के साथ अब हमारे सामने तीन समस्या अलग-अलग है । पहली समस्या – मांस,शराब की बिक्री को कैसे रोकें ? दूसरी समस्या – सरकार से कैसे बात- चीत करें ? तीसरी समस्या – मांस,शराब व्यापार और करने वाले अब आगे न बढ़ें और जो हमारे पवित्र स्थान में घुस आएं हैं, उन्हें कैसे निकालें ।

चौथी समस्या- शिखर जी की नहीं, हमारे सारे तीर्थों में पवित्रता का क्षरण हो रहा है । जैन व अजैन कोई भी तीर्थ हो, वो पावन स्थली है, इन स्थानों पर पवित्रता और आध्यात्मिकता के संरक्षण की जिम्मेदारी कौन उठाएगा ?

समस्या यह भी है कि यहां से आगे के लिए क्या योजना बनाएं ? जो समस्या अब आ रही है भविष्य में कभी न आए, इस बात की गारंटी हम कैसे तय करें। हम तभी सही दिशा में सोच पाएंगे, जब हम अपने लक्ष्य पर ध्यान देंगे न को दूसरे के लक्ष्य पर । कौन क्या कह रहा है ,कौन क्या कर रहा है, क्या सोच रहा है । उसके बजाए हमें अपने लक्ष्य पर ध्यान देना है ।

समस्याओं के कंटक पथ, ये हैं समाधान की नई पगडंडियां

मुझे ऐसा लगता है पहले हम एक सेंटर की स्थापना करें, जहां से हमे शिखर जी गतिविधियों की ओरिजनल स्थिति पता चले । अभी हो यह रहा है कि सोशल मीडिया के माध्यम से हम कही गई बातों में बातो में भ्रमित हो रहे हैं । हमारी दिशाहीनता से ऐसा लग रहा है कि हम समाज के लोग ही एक-दूसरे का पक्ष नहीं समझ पा रहे हैं ।

इस बात का अहसास तब हुआ जब हमनें समाज के अलग-अलग लोगों के विचार सुने और समझें । अधिकारियों और समाज के लोगो से उनकी राय जानी तो लगा कि नेतृत्व की कमी और मैनेजमेंट की कमी है । दूसरी समस्या का समाधान कुछ इस संभव है सरकार दो ही बातें समझती है । एक तो वोट बैंक और दूसरी अर्थव्यवस्था का नोट बैंक ।

जैन समाज दोनों ही बातों में सक्षम है, मेरा ऐसा मानना है । ये तो समाज के प्रबुद्ध लोग ही तय करें कि आगे क्या और कैसे किया जाना है । लेकिन मेरे मन की व्यथा है कि अगर हम अपने सर्वोच्य तीर्थ स्थान को ही सुरक्षित और संरक्षित नहीं करवा पाए और आती-जाती सरकारों में इसकी पवित्रता का यूं ही क्षरण होता रहा तो फिर सवाल हमारे तीर्थों की सुरक्षा का नहीं बल्कि हमारे स्वधर्म और खुद हमारी सुरक्षा का भी है ।

इसीलिए समाज के प्रभावशाली लोगों को सरकार से बात चीत की रणनीति तैयार करना चाहिए ।

ये सत्य हैं कि मांस शराब आदि सम्मेद शिखर जी की पवित्रता को नष्ट कर रही है, उसके लिए हमें शिखर जी में धर्मशालाओं,मंदिर आदि में काम उन लोगो को दें, जो जैन समाज से कमजोर वर्ग से है । देश के किसी गांव,शहर में कहीं भी ऐसे लोग हैं, जिनके पास काम नहीं है ।

उन्हें शिखर जी के आप पास गृह उद्योग लगाने में मदद करें । उनके बच्चों को पढ़ने के स्कूल, कोचिंग की वहीं व्यवस्था करें । उनके परिवार के लोगों की यह जिम्मेदारी रहे कि वे लोग स्वयंसेवक बन परिस्थितियों पर नजर बनाए रखें ।
हम सरकार से अनुरोध करेंगे कि शिखर जी क्षेत्र में एसपी,कलेक्टर व अन्य अधिकारी वहीं लगाएं जो वहां के इतिहास को जाने-समझें ।

बेहतर तो यही है कि वहां ऐसे जैन अधिकारी लगाएं जो जैन समाज की मान्यताओं और सरकारी सिस्टम के बीच समन्वय बनाकर कड़ी के रूप में काम करे ।

शिखर जी क्षेत्र के लिए हो भविष्य का प्लान

इन सब घटना क्रम को देखकर शिखर जी और अन्य क्षेत्रों के लिए भविष्य के मास्टर प्लान तैयार करें । जहां पर आध्यात्मिक वातावरण बना रहे । औषधीय पेड़-पौधे लगें । आध्यात्मिक ज्ञान के विकास के धार्मिक केन्द्र खुलें ।

शिखर जी का विकास हो । विकास के लिए कैसे धन का संचय हो । इस पर विचार कर मास्टर प्लान तैयार करना चाहिए । भविष्य में हमें इस प्रकार के आंदोलन की आवश्यकता न हों, इस पर कभी फिर से चर्चा करेंगे ।

– अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज

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