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सम्मेद शिखरजी प्रकरण पर संवाद: “यह एक संकट भी- एक अवसर भी…

 

 

सम्मेद शिखरजी को पर्यटन स्थल घोषित करना विकास कार्य नहीं, जैन तीर्थ क्षेत्र का विनाश है । यह जैन धर्म एवं जैन समाज पर आया संकट है। अयोध्या, काशी, उज्जैन आदि हिन्दु तीर्थों के विकास के लिए सरकारें करोड़ों अरबों रुपये खर्च कर रहीं हैं तो जैनों के सबसे बडे तीर्थ क्षेत्र के लिए धर्मक्षेत्र संरक्षण एवं विकास के नाम से बजट क्यों नहीं दे रही है?

पर्यटन का बहाना क्यों ? सब जानते हैं कि पर्यटन के नाम पर विकास तो दिख जायेगा लेकिन जैन तीर्थ क्षेत्र मर जायेगा। और वास्तव में दोनों वर्तमान सरकारें यही चाहती हैं ।

कट्टर हिन्दु विस्तारवादी नीति के तहत अन्य धर्मों को इसी प्रकार से या तो हतोत्साहित किया जा रहा है या नष्ट किया जा रहा है । इस खुली बहस होना चाहिए। जैनों के साथ गैर जिम्मेदाराना और दोगला व्यवहार क्यों ?

प्राण संकट की इस घडी में इस संकट से तो उबरना तो ही है साथ ही इस अवसर का पूरा लाभ भी लेना है ताकि भविष्य में इस प्रकार की दु:स्थिति पैदा ही ना हो एवं कब्जा वाले जैन तीर्थक्षेत्रों की मुक्ति के लिए ठोस योजना बन सके। इस संबंध में कुछ विचारणीय बिन्दु हो सकते हैं –

. शाश्वत सिद्धक्षेत्र सम्मेद शिखर प्रकरण पर सकल जैन समाज (दिगम्बर एवं श्वेताम्बर) की एक नीति, एक नेतृत्व, एक नारा एवं एक ही झंडा हो।

. दोनों सम्प्रदायों के बडे आचार्यों के मार्गदर्शन में प्रतिनिधि कमेटी बने जो पूर्व में शिखरजी के मामलों को देख रही कमेटी के साथ मिलकर कानूनी, राजनैतिक, पुरातात्विक, ऐतिहासिक आदि समग्र पक्षों पर विशेषज्ञों से राय लेकर प्रकरण की पूरी छानवीन करे एवं निर्णय दे कि तीर्थक्षेत्र सम्मेद शिखर एवं जैन समाज के हित में क्या है जो करना चाहिए।

. अगर सरकार नहीं मानती है या छल करती है या आधा अधूरा, मानती है तो किस स्तर पर क्या करना चाहिए। इस पर विधिवत् योजना बने एवं उस योजना की क्रियान्विति के लिए मानवीय, आर्थिक संसाधन कैसे जुटाये जायेगे इस पर सहमति होना चाहिए। और अभी से फंडिंग होना चाहिए।

. सरकार मान भी लेती है तो वह क्षेत्र की सुरक्षा और विकास के लिए क्या करेगी या हम क्या चाहते हैं इस पर भी राय स्पष्ट होना चाहिए ।

. अभी अवसर है अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के तहत या स्वतंत्र रूप से जैन सुरक्षा एवं विकास प्रकोष्ठ की मांग होना चाहिए जिसमें वजट आवंटन भी हो तो कार्य करने की सुविधा और स्वतंत्रता भी।

. वर्तमान में देश, विदेश में क्षतिग्रस्त/ उपेक्षित/ अतिक्रमित जैन पुरातात्विक मामलों में उनके संरक्षण और विकास के लिए हम सरकार से क्या चाहते है उसका प्रारूप भी तैयार कर सरकार के सामने लाना चाहिए।

. अगर सरकार पर्यटन घोषणा को वापिस भी ले लेती है तो वह अब सुरक्षा और विकास के लिए सकारात्मक कुछ भी नहीं करने वाली है। कारण स्पष्ट है। या करेगी भी तो ऊंट के मुंह में जीरे के समान। शिखरजी में सुरक्षा एवं चिकित्सा की उच्च स्तरीय व्यवस्था की आवश्यकता है। सरकार की पुलिस जितना करेगी वह पर्याप्त नहीं है। क्षेत्र कमेटी के अपने सशस्त्र गार्ड पर्याप्त मात्रा में होना चाहिए जिन पर हमारा नियंत्रण हो।

. अगर सम्मेद शिखरजी जैन तीर्थ क्षेत्र है तो उस पर जैन कमेटी द्वारा संरक्षण एवं विकास कार्य कराने की स्वतंत्रता भी होना चाहिए। वन एवं पर्यावरण के नाम पर बाधायें क्यों उत्पन्न की जाती हैं। हां, अगर अन्य मत या अन्य प्रकार की गतिविधियां संचालित होती हैं तो सख्ती भी होना चाहिए।

. सम्मेद शिखरजी एवं अन्य सभी जैन तीर्थक्षेत्र के एरिया को अहिंसा जॉन घोषित होना चाहिए।

. जैन तीर्थ सुरक्षा एवं विकास के लिए एक दिवस के रूप में भी मनाया जाना चाहिए। पूर्व में प्रचारित अगर 25 जनवरी को जैन तीर्थ सुरक्षा दिवस के रूप में सकल जैन समाज घोषित करती है तो एक बडी उपलब्धि होगी। क्योकि जैन सुरक्षा संवैधानिक मसला बनता जा रहा है और अगर गणतंत्र दिवस के ठीक पहले यह दिवस मनाया जाता है तो बहुत महत्वपूर्ण होगा। उस दिन पूरे देश में एक साथ निकलने वाली रैली, ज्ञापन, प्रदर्शन का अपना महत्व होगा इसे सरकार भी देखेगी और आम जन भी गिरनार क्षेत्र मुक्ति की योजना के लिए भी ये सब आवश्यक है ।

सम्मेद शिखरजी भारी है।

अब गिरनारजी की बारी है ।

कब्जा वाले जैन तीर्थों पर

मिलकर लडने की तैयारी है ।

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