समाचार सम्मेदशिखर

सम्मेद शिखर: सिर्फ आंदोलन नहीं, पवित्रता का संकल्प भी लें, संकट में छिपा है अवसर भी, आइए इसका उपयोग करें

 

मनीष गोधा-  शाश्वत तीर्थ श्री सम्मेद शिखर जी को पर्यटन स्थल घोषित किए जाने के विरोध में देश भर में आंदोलन चल रहे हैं । जैन समाज सडकों पर है और पूरे देश से इस आदेश के खिलाफ आवाज उठ रही है, लेकिन सिर्फ आंदोलन से काम नहीं चलेगा ।

बीस तीर्थंकरों की निर्वाण स्थली की पवित्रता बनाए रखने की जिम्मेदारी हमारी है, इसलिए आंदोलन के साथ ही यह जरूरी है कि जिस भी शहर, गांव, कस्बे में लोग सडक पर उतर रहे हैं ।

वहां आयोजित सभा में देव-शास्त्र-गुरू के नाम पर संकल्प करें कि पहाड की पवित्रता बनाए रखेंगे और इसके लिए जो हम कर सकते हैं, वह जरूर करेंगे।

पूरे देश में जैन समाज बहुत बडा वोट बैंक नहीं है और इसीलिए बहुत बडी राजनीतिक ताकत भी नहीं है । हम उस तरह का आंदेालन भी नहीं कर सकते हैं जैसा हम देश की दूसरे धर्मो और जातियों को करते देखते हैं । लेकिन हमारे पास अहिंसा की ताकत है और इसी के बल पर हमने अब तक हमारी परम्पराओं पर आए संकटों से पार पाई है ।

इस बार भी हमें पूरा विश्वास है कि सरकार सुनेगी और उसे यह आदेश वापस लेना भी पडेगा । हालांकि राजनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो यह सरकार के लिए थोड़ा मुश्किल होगा ।

क्योंकि जिस जगह सम्मेद शिखर तीर्थ है, वहां की जैन समुदाय बडी संख्या में नहीं है और इसीलिए सरकार अपने दूसरे वोट बैंक को नाराज करने में थोडा हिचकिचाएगी, लेकिन हमें दबाव बनाए रखना है ।

इस संकट को अवसर बनाइए
हमारे दबाव में आकर सरकार आदेश वापस ले भी लेगी । लेकिन इसके बाद क्या….यदि इसके बाद फिर वही सब कुछ होता रहा जो अब तक पहाड पर हो रहा है तो फिर हमारे इस आंदोलन और रोष का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा ।

इसलिए इस संकट को एक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए । यह संकट एक ऐसा अवसर है जिसके माध्यम से हम अपने शाश्वत तीर्थ की पवित्रता फिर से कायम कर सकते हैं । यह ठोकर है, जिससे हमें सबक लेना ही चाहिए ।

सम्मेद शिखर पर पिछले वर्षों में जिस तरह का अनाचार और अपवित्रता देखी गई है और जो कुछ हुआ है, उसके पीछे कारण हम ही हैं, इसीलिए यह संकट भी आया है । अब हमें ना सिर्फ इस संकट को टालना है, बल्कि इसे एक अवसर में बदलना है ।

इसका तरीका यही है कि सम्मेद शिखर को बचाने के आंदोलन से जुडा प्रत्येक जैन यह संकल्प ले कि वह इस पर्वत की पवित्रता हर हालत में अक्षुण्ण रखेगा और ऐसा कोई काम नहीं करेगा जिससे यह पर्वत अपवित्र हो । तीर्थ की वंदना इस संकल्प के साथ ही आरम्भ करूंगा और जब तक वंदना नहीं हो जाती तब तक इस संकल्प का प्राणप्रण से पालन करूंगा ।

जैन धर्म में संकल्प का बहुत महत्व है और हम जैन समाज के लोग देश दुनिया में अपनी पहचान अपने संकल्प के प्रति अपनी निष्ठा और अडिगता के लिए ही जाने जाते हैं, इसलिए तीर्थ बचाने के लिए सडक पर उतर रहा हर जैन धर्मावलम्बी इसी संकल्प के साथ घर लौटे ।

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