क्या आप जानते हैं ?
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– श्रावक के छह कर्मों के साथ छह कर्तव्य भी हैं ।
– दूसरों के दुख को अपना समझने वाला और दान करने वाला होता है श्रावक ।
– श्रावक धर्म के पालन से ही संभव है विश्व शांति ।
श्रावक वह होता है, जो गृहस्थ धर्म को धारण करता है। उसके भी कुछ नियम आदि होते हैं, ताकि मानव में मानवता का भाव जाग्रत हो सके । ऐसा होने से ही वह मनुष्य स्वयं और जगत, दोनों का भला कर सकता है ।
-श्रावक वह मर्यादित व्यक्ति है, जिसके आचरण, खान-पान, रहन-सहन, बोल-चाल से लोगों का तनाव दूर हो, जिसके सम्पर्क में आने से मानवता का विस्तार हो, जिसके भीतर अहिंसा, करुणा, दया और धर्म के प्रति आस्था व श्रद्धा हो, जो परमात्मा का दूत बनकर आया हो । जो दूसरों के दुखों को अपना दुख समझता हो । मानव धर्म की परिभाषा में इन सभी बातों का पालन करने वाले को ही श्रावक कहा जाता है ।
– मां के गर्भ के बाद जिसका गुरुओं द्वारा संस्कार जन्म हो जाता है, उसे श्रावक कहते हैं । जिसका गर्भ जन्म और संस्कार जन्म, दोनों हो गए हैं, उसे शास्त्र में द्विज कहा गया । गुरु की आज्ञा का पालन करने वाला और णमोकर मंत्र पर श्रद्धा रखने वाला हो, जो ज्ञान ग्रहण करने की इच्छा रखता हो तथा जो अहिंसा धर्म की पालना कर कषायों को कम करने में लगा हो, वह श्रावक है ।
– नियम, व्रत, त्याग आदि की अधिकता और न्यूनता के अनुसार श्रावक के कई भेद शास्त्रों में पढ़ने को मिलते हैं । सामान्य रूप से हम यह कह सकते हैं कि जल छानकर पीने से शुरू होकर मुनि बनने के पहले तक के सभी नियम आदि श्रावक के भेद में आते हैं । बच्चा जब 45 दिन का होता है, तभी से उसे संस्कार देने का कार्य प्रारम्भ हो जाता है । उसे सबसे पहले णमोकार मंत्र सुनाया जाता है। तत्पश्चात अष्टमूलगुण धारण करवाया जाता है । इसके बाद माता-पिता उसे मद्य, मांस, मधु आदि का सेवन 8 वर्ष तक नहीं कराने का प्रण लेते हैं और उसके बाद बच्चों को यह बताया जाता है कि तुम्हारे लिए इन सभी का आजीवन त्याग है ।
– पूर्व कर्म से गर्भ जन्म होता है और अपने जन्म को सफल करने के लिए संस्कार जन्म होता है । संस्कार जन्म भीतर की कमियों को निकालता है और व्यक्ति को धीरे-धीरे इस योग्य बनाता है कि उसमें किसी प्रकार कोई कुसंस्कार न रहे और वह धर्म को धारण करने योग्य बन जाए । वैसे देखा जाए तो संस्कारों का काम तो गर्भ से प्रारम्भ हो जाता हैं क्योंकि गर्भ से मोक्ष तक की 53 क्रियाओं का वर्णन भी शास्त्रों में किया गया है ।
– तुम अंत में यह समझना कि ये सब नियम, व्रत आदि का पालने करने के पीछे मुख्य उद्देश्य है । अहिंसा धर्म का पालन इसलिए श्रावकों की क्रिया का वर्णन अलग-अलग शास्त्रों में अलग-अलग प्रकार से किया गया है । इन सब का सार यही है कि अहिंसा का पालन करते हुए गृहस्थ धर्म का पालन करना चाहिए ।
सकारात्मक दृष्टि से देखें तो सब अच्छा ही दिखेगा
– गृहस्थ के द्वारा पूजा आदि के साथ अन्य कार्य में हिंसा का अंश होता है तो गृहस्थ की अहिंसा का पालन कैसे होगा लेकिन ध्यान रखना हमारे तीर्थंकर आदिनाथ भगवान ने भी धर्म की पूजा, दान आदि क्रिया और अपने जीवनयापन के लिए छह कर्म करने को कहा है । ये छह कर्म इस तरह हैं, असि, मसि, कृषि, वाणिज्य, शिल्प और विद्या…
इनके माध्यम से अपने-अपने कुल के अनुसार आजीविका अर्जित करने का उपदेश उन्होंने दिया है। आजीविका के लिए धन कमाना जरूरी है लेकिन वह भी न्यायपूर्वक हो । अन्यायपूर्वक धन नहीं कमाना चाहिए ।
– आजीविका के लिए धन कमाने में जो हिंसा का दोष लगता है, उसकी शुद्धि के लिए ही छह आवश्यक कर्तव्यों का वर्णन किया गया। ये कर्तव्य हैं- देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप और त्याग ।
इन सब में हिंसा तो होती है तो उससे कैसे बचें?
इस प्रश्न के उत्तर में आचार्य समंतभद्र स्वामी ने वासुपूज्य भगवान की स्तुति करते हुए कहा है कि
पूज्यं जिनं त्वाऽर्चयतो जनस्य सावय-लेशो बहु- पुण्य-राशौ। दोषाय नाडलं कणिका विषस्य न दूषिका शीत- शिवाम्बुराशौ॥ 3॥
अर्थात
वासुपूज्य भगवान की स्तुति करते हुए वे कहते हैं कि हे भगवन ! आपकी भक्ति सावद्य होते हुए भी हानिकार नहीं है क्योंकि जैसे अमृत से भरे हुए क्षीरसागर में कोई जहर को एक बूंद डाल दे तो वह किसी प्रकार से अपना हानिकारक प्रभाव नहीं दिखा सकती है । उसी प्रकार हे भगवान, आपकी भक्ति से इतनी पुण्य राशि इकट्ठी होती है कि सावद्य से उपार्जित पाप भी प्रभावहीन हो जाता है ।
गृहस्थ धर्म को धारण करने की योग्यता क्या है?
वह न्यायपूर्वक धन कमाने वाला होना चाहिए । माता-पिता, गुरुजनों, गुणों से श्रेष्ठ मुनियों का आदर- सत्कार, पूजा करने वाला होना चाहिए । प्रशंसनीय सत्य वचनों को बोलने वाला होना चाहिए। परस्पर विरोध रहित धर्म-अर्थ और काम, इन तीन वर्गों (पुरुषार्थ) का सेवन करने वाला होना चाहिए ।
तीन पुरुषार्थ के योग्य स्त्री, ग्राम और घर, जिसके पास है ऐसा, लज्जाशील शास्त्रोक्त योग्य आहार तथा विहार करने वाला होना चाहिए । आर्य पुरुषों की संगति करने वाला होना चाहिए । बुद्धिमान अर्थात् हित-अहित का विचार करने वाला होना चाहिए। दूसरों के द्वारा किए हुए उपकार को मानने वाला होना चाहिए।
इंद्रियों को वश में करने वाला होना चाहिए । धर्म की विधि को सुनने वाला होना चाहिए । दुखी जीवों पर दया करने वाला और पापों से डरने वाला पुरुष होना चाहिए । (सागर धर्मामृत)
जानिए श्रावक के कर्तव्य
– श्रावक का कर्तव्य होता है कि वह पूर्वजों की कीर्ति की रक्षा करे । देव पूजा, अतिथि सत्कार, बंधु-बांधवों की सहायता और आत्म उन्नति करे । इसके लिए रयण सार में कहा गया है कि श्रावक मुख्य रूप से दान-पूजा करने वाला होता है ।
फल
– उत्तम रीति और निर्दोष रीति से श्रावक आचरण का पालन करने वाला तीन भव में सिद्ध होता है या अधिक से अधिक आठवें भव में सिद्ध हो जाता है ।
-श्रावक मोक्ष को प्राप्त नहीं हो सकता है क्योंकि उसे पंचसुना दोष लगता है जो ओखली, चूल्हा, घड़ा, झाडू, चक्की हैं । श्रावक मुनि बनकर ही मोक्ष को प्राप्त कर सकता है ।
अंत में समझो यह , श्रावक धर्म का पालन किए बिना धर्म और धर्मात्माओं की रक्षा सम्भव नहीं है। अगर इसे सहज और सरल भाषा में कहें तो श्रावक के नियमों का पालन करने पर विश्व में शांति का वातावरण बन सकता है और एक-दूसरे की भावनाओं को समझने की बुद्धि आ जाती है। ऐसे श्रावक झगड़े से ज्यादा समझौते में विश्वास रखते हैं।
(अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज की डायरी से)













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