जैन समाज के शिखर पुरुषों से संवाद

श्रीफल जैन न्यूज़ संवाददाता- ये जो हालात बनें हैं सम्मेद शिखर को लेकर, इसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाना चाहिए ?
अंतर्मुखी श्री पूज्य सागर जी महाराज (धरियावद से) – मुझे आश्चर्य है कि इस मामले में किसकी चूक है, इसकी छानबीन ही नहीं हो रही । मेरी पहली राय ये है कि पर्यटन,वन मंत्रालय, केन्द्र और राज्य के प्रतिनिधि, जैन समाज के प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठें और बताएं कि आखिर गलती है किसकी ? हमारा तीर्थ आज का तो है नहीं, सदियों से हमारी आस्था उस स्थान को लेकर हैं ।
हमें तो ये भी नहीं पता कि ये गलत फैसला हुआ है या गलतफहमीं । अब जैन समाज ऊर्जावान हो रहा है तो सभी पल्ला झाड़ रहे हैं । पहले किसने ये समस्या पैदा की, उसका चेहरा सामने आना चाहिए । जैन समाज के वकीलों को इस बारे में पहल कर सच्चाई समाज के सामने लानी चाहिए ।
श्रीफल जैन न्यूज़ संवाददाता– आज संसद में पर्यटन मंत्री की बात से ऐसा लग रहा है कि सारा मामला राज्य सरकार का है ।
अंतर्मुखी श्री पूज्य सागर जी महाराज (धरियावद से)- मैं वही तो कह रहा हूं । इस मामले में तीन पक्ष है । पहला केन्द्र सरकार, दूसरा राज्य सरकार और तीसरा पक्ष जैन समाज । मुझे आश्चर्य है कि किसी भी गलती या चूक हो या न हो लेकिन इतने बड़े फैसले में जैन समाज को शामिल क्यों नहीं किया ।
आपने अयोध्या का मामला देखा है । ये ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट में मामला चला लेकिन फैसला होने के बाद भी साधु-संतों से संवाद कर मंदिर बन रहा है । अगर सच है तो भी और अफवाह है तो भी जैन समाज के साथ ऐसा अत्याचार क्यों और किसने कर दिया, ये पता लगाना चाहिए ।
श्रीफल जैन न्यूज़ संवाददाता– महाराज जी आप तो स्पष्टवादी कहे जाते हैं । मुझे एक बात बताइए, ऐसा तो नहीं है कि वहां पहली बार प्राकृतिक रूप से कथित छेड़-छाड़ हो रही है । पहले वहां कच्चा पहाड़ था, आज देखिए गाड़ियां जा रही है । जैन समुदाय करे तो ठीक, सरकार करे तो गलत, ये तो ठीक कहा जा सकता है ?
अंतर्मुखी श्री पूज्य सागर जी महाराज (धरियावद से)- देखिए, आपकी बात काफी हद तक सही है । सम्मेद शिखर का वो पुरातन स्वरुप अलग था । सरकार और स्थानीय सरकारें तो अब पर्यटन की बात कर रहे हैं । हमारे जैन अनुयायियों ने ही वहां जाकर नई परंपरा ऐसी शुरु कर दी हैं कि मूल तत्व कहीं पीछे छूट रहा है ।
अगर आप ये तय करें कि सम्मेद शिखर की यात्रा पर जाते समय, वहीं रुकेंगे जहां जैन धर्मशालाओं की व्यवस्थाएं है. वही खाएंगे जो धर्मशाला में होगा, बाजार से कुछ खरीदारी कर नहीं खाएंगे । मोटरगाड़ियों की बजाए परंपरागत साधन या पैदल ही यात्रा करेंगे तो आज ही नहीं आने वाली दशकों तक नैतिक रूप से आपकी आवाज और मजबूत रहेगी ।
हमनें गलियारे छोड़े या रास्ते बदले तभी सम्मेद शिखर के अस्तित्व को लेकर ये गंभीर सवाल खड़ा हुआ है । ये सच है ।
श्रीफल जैन न्यूज़ संवाददाता – आंदोलन में जिस तरह से अलग-अलग बातें बोली जा रही है । इससे लग रहा है कि आंदोलन का एक छिपा पहलू यह है कि आप लोग नहीं चाहते कि अजैन शिखर ही नहीं पूरे इलाके में कहीं नहीं आए, क्या ऐसा है ?
अंतर्मुखी श्री पूज्य सागर जी महाराज (धरियावद से) – ऐसा नहीं है । जैन-अजैन नहीं जैन समुदाय मानवता को सर्वोपरि मानता है । हमारे तीर्थंकरों की पंरपरा को हम इस तरह निभाते हैं कि पूरा देश इससे लाभान्वित होता है । इतनी बड़ी सोच वाला सकल जैन समाज इतनी छोटी बात पर नहीं सोचता ।
मुद्दा यह है कि जो हमारे यहां आए, हमारे यहां की परंपराओं को अपनाए । हम ही क्यों, मैं तो देश की सरकार से कहना चाहता हूं कि धार्मिक पर्यटन को लेकर एक अलग से कानून लाए जिसमें ये अनिवार्यता हो कि किसी भी धर्म का स्थल हो, वहां एक से तीन किलोमीटर के दायरे में उसी परिवेश और पंरपरा में ही आना-जाना होगा ।
हिन्दू समेत सभी धर्मों के तीर्थ स्थलों में स्थानीय,पर्यटकों के मेल-जोल ने व्याधियां पैदा की है । जैनियों की तरह अन्य धर्मों में भी इसे लेकर लोगों के मन में बात है । आज जैन कह रहे हैं, कल बाकी लोग कहेंगे । लेकिन हमें दुख यही है कि बाकी लोग कहें न कहें उनकी सुन ली जाती है । हम शांतिप्रिय,अहिंसा के रास्ते पर चलते हुए आस्था निभा रहे हैं तो हमें ये सब झेलना पड़ रहा है ।
(महाराज श्री से काफी विस्तार से साक्षात्कार दिया है, शेष बात-चीत कल के अंक में…ज़रूर जुड़िए )












