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गुरुमां ने बरैया जैन मंदिर में दिया उदबोधन : हमारी कषाय ही हमें दुख देती हैं-आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी


जैन साध्वी गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने श्री दिगम्बर बरैया जैन मंदिर, ग्वालियर में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि 25 कषाय ऐसी हैं, जो हर कर्म के साथ रहती हैं वरना अन्य कर्म प्रभावहीन हैं। अनन्तकाल से मात्र कषायों के वशीभूत हुए हैं। कषाय ने मालकियत जमा रखी है। हम एक क्षण के लिए भी कषायों के बगैर रह नहीं सकते। पढ़िए मनोज नायक की रिपोर्ट…


ग्वालियर। हमारे जीवन का सारा संचालन कषाय और योग के द्वारा चल रहा है। हमारे निर्देशक, हमारे डायरेक्टर कषाय और योग हैं। जीव के भाव कषाय और योग द्वारा उतपन्न हो रहे हैं। आज तक, अभी तक एक क्षण के लिए भी कषाय रहित नहीं हो पाते हैं। अभी आपको क्या लग रहा है, आप कषाय रहित हो गए या नहीं हुए। व्यक्ति में कषाय नहीं हैं, पर अंदर ही अंदर क्या परिणाम चल रहे हैं, यह तो स्वयं को ही पता चलता है। भाव परिवर्तन में जितने बन्ध हैं, वे पूर्ण किये हैं। जितने अध्यवसाय स्थान हैं, वे पूर्ण किये हैं। कषाय और योग के जाल से बाहर नहीं निकले। कषाय ने जितना स्थिति बन्ध कराया, अनुभाग बन्ध कराया, हमने किया है । कभी कम-कभी ज्यादा, कभी मंद-कभी तीव्र, कभी और तरह से। इसीलिए इसका नाम कषाय है। उक्त विचार जैन साध्वी गणिनी आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी ने श्री दिगम्बर बरैया जैन मंदिर, ग्वालियर में धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किये।

मान ही महसूस कराता है अपमान

स्वस्तिधाम प्रणेत्री, विदुषी लेखिका गुरुमां ने अपने सारगर्वित उदबोधन में कषायों के संदर्भ में बताया कि जो आत्मा को कसे, जो आत्मा को दुख दे, उसे कषाय कहते हैं। हमें कोई दूसरा दुख नहीं देता, हमारी कषाय ही हमें दुख देती है। किसी ने हमारा अपमान किया, ये किसने बताया, मान कषाय ने। यदि मान कषाय न हो तो मैं आत्मा हूं यही भान होगा। मान ही अपमान महसूस कराता है। मान ही ये अहसास कराता है कि मैं भी कुछ हूं। जब मैं की याद आये, तब समझना कि मान कषाय का उदय चल रहा है। याद आने का मतलब ही कर्म है। जिस रात गहरी नींद में सोते हो। कुछ याद न आये तो कहते हो कि आज बहुत अच्छी नींद आई। सब कुछ भूल गए और नींद की गफलत में चले गए। ऐसे ही दांत की याद तब आती है, जब दांत में दर्द होता है। याद आने का मतलब है कषाय।

बिना कषाय कर्म नहीं देते फल

असाता वेदनीय के समय अरति भय शोक कषाय का उदय रहता है। बिना कषाय के कर्म अपना फल देने में समर्थ हैं ही नहीं। जिस समय अच्छा भोजन, कपड़ा, गाड़ी, मकान, परिवार मिले उस समय रति हास्य वेद का उदय भी हो सकता है। जैसे कोई चीज ऐसी भी होती है, जो हर दवाई में डाली जाती है। ऐसे ही 25 कषाय ऐसी हैं, जो हर कर्म के साथ रहती हैं वरना अन्य कर्म प्रभावहीन हैं। अनन्तकाल से मात्र कषायों के वशीभूत हुए हैं। कषाय ने मालकियत जमा रखी है। हम एक क्षण के लिए भी कषायों के बगैर रह नहीं सकते।

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