दोहे भारतीय साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा हैं, जो संक्षिप्त और सटीक रूप में गहरी बातें कहने के लिए प्रसिद्ध हैं। दोहे में केवल दो पंक्तियां होती हैं, लेकिन इन पंक्तियों में निहित अर्थ और संदेश अत्यंत गहरे होते हैं। एक दोहा छोटा सा होता है, लेकिन उसमें जीवन की बड़ी-बड़ी बातें समाहित होती हैं। यह संक्षिप्तता के साथ गहरे विचारों को व्यक्त करने का एक अद्भुत तरीका है। दोहों का रहस्य कॉलम की 133वीं कड़ी में पढ़ें मंजू अजमेरा का लेख…
“जब लग भक्ति से काम है, तब लग निष्फल सेव।
कह कबीर वह क्यों मिले, निष्कामा निज देव॥”
इस दोहे में कबीर जी भक्ति की शुद्धता और ईश्वर-प्राप्ति के मूल रहस्य को उजागर करते हैं। वे बताते हैं कि जब तक भक्ति के पीछे कोई स्वार्थ, कामना या लाभ की आकांक्षा हो, तब तक वह भक्ति असली नहीं होती। यह केवल सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति का साधन बन जाती है।
जब व्यक्ति ईश्वर की आराधना किसी लाभ या उद्देश्य के लिए करता है— जैसे धन, रोग मुक्ति, संतान प्राप्ति या सुख— तब वह भक्ति केवल दिखावा होती है, क्योंकि इसका केंद्र ‘ईश्वर’ नहीं बल्कि ‘स्वार्थ’ होता है। ऐसी भक्ति में प्रेम नहीं, बल्कि अपेक्षा और लोभ छुपा होता है।
कबीर जी कहते हैं कि ईश्वर निष्काम हैं — वे किसी से कुछ नहीं चाहते, और न ही किसी को शर्तों पर कुछ देते हैं। इसलिए वही ईश्वर को पा सकता है, जिसकी भक्ति भी निष्काम हो, यानी बिना किसी फल की इच्छा के हो।
इस दोहे से स्पष्ट होता है कि जब तक आत्मा में ‘मैं’ और ‘मेरा’ रहेगा, परमात्मा तक पहुंचना असंभव है। ईश्वर को पाने के लिए अपने अहंकार का त्याग जरूरी है।
भक्ति को किसी व्यापार की तरह न बनाएं — “मैं जप करूं, तो तू फल दे।”
सच्चा भक्त कहता है—
“मैं कुछ न मांगूं, मुझे तू चाहिए।”
बस यही भाव और पूर्ण समर्पण ईश्वर को आकर्षित करता है।
कबीर कहते हैं कि ईश्वर कोई वस्तु नहीं, जिन्हें मांगकर पाया जाए। वे एक चेतना हैं, जो केवल प्रेम, समर्पण और निष्कामता से अनुभव की जा सकती है।
सच्चे भक्त के लिए ईश्वर ही सब कुछ होता है— फल, पुण्य, सिद्धि सभी तुच्छ लगते हैं।
कबीर का यह दोहा भक्ति की सबसे ऊंची अवस्था की ओर संकेत करता है — जहां भक्ति में न कोई कामना हो, न कोई अपेक्षा, केवल प्रेम और समर्पण हो।
ऐसी ही भक्ति फलदायी है, और इसी में ईश्वर का साक्षात्कार संभव है।













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