भोपाल के झिरनों स्थित श्री दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज ने कहा कि बाहर के साधन प्राप्त करना सरल है, परंतु भीतर की शांति पाना जीवन का सबसे दुर्लभ लाभ है। उन्होंने भगवान की सच्ची भक्ति और आंतरिक श्रद्धा के महत्व पर प्रकाश डाला। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
भोपाल। गुणायतन एवं विद्या प्रमाण गुरुकुलम् के प्रणेता मुनि श्री प्रमाण सागर जी महाराज ने शनिवार को झिरनों स्थित श्री दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित प्रातःकालीन धर्मसभा में कहा कि “शांति पाने के लिए मनुष्य को भगवान के चरणों में आना आवश्यक है।” उन्होंने कहा कि बाहर के संसाधनों की प्राप्ति कठिन नहीं, लेकिन भीतर की शांति सबसे मूल्यवान उपलब्धि है।
प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि सभा की शुरुआत भगवान नेमीनाथ स्वामी के मस्तकाभिषेक एवं शांतिधारा से हुई। तत्पश्चात गणधर विलय विधान संपन्न हुआ। मुनि श्री ने कहा कि भगवान की उपस्थिति का अहसास कोई अन्य नहीं करा सकता — यह हमारे भीतर की श्रद्धा से ही संभव है। मूर्ति के नहीं, मूर्तिमान के दर्शन करो — जिनविम्ब के दर्शन से ही सम्यक दर्शन प्राप्त होता है।
उन्होंने झिरनों मंदिर को आत्मशांति का केंद्र बताते हुए कहा कि “यह स्थान ऐसा है जहाँ बैठते ही ध्यान स्वतः लग जाता है।” मुनि श्री ने कहा कि भगवान की भक्ति में इतने रच-बस जाओ कि तुम्हारे और भगवान के बीच की दूरी समाप्त हो जाए।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा — “अर्जुन गुरु के पास था, पर एकलव्य ने गुरु को अपने हृदय में बसाया। अर्जुन को जो नहीं मिला, एकलव्य ने पा लिया।” मुनि श्री ने कहा कि यही अंतर है भगवान के पास जाने और भगवान को अपने भीतर बिठाने में।
कार्यक्रम का संयोजन दि. जैन पंचायत चौक मंदिर भोपाल द्वारा किया गया। अध्यक्ष मनोज जैन बांगा ने अपनी टीम के साथ मुनिसंघ को श्रीफल समर्पित किया और आचार्य श्री से चौक मंदिर आने का निवेदन किया। मुनि श्री का रात्रि विश्राम टी.टी. नगर जैन मंदिर में हो रहा है।













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