कुंदकुंद ज्ञानपीठ, इंदौर में आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के अंतिम सत्र में मुनि श्री पूज्यसागर महाराज ने आचरण और व्यवहार की महत्ता पर प्रकाश डाला। विद्वानों ने सिरि भूवलय पर गहन मंथन किया। पढ़िए श्रीफल जैन न्यूज़ से प्रीतम लखवाल की यह विशेष रिपोर्ट……
जहाँ शब्द नहीं, आचरण बोलता है… वहीं से शुरू होती है सच्ची साधना।
इंदौर। कुंदकुंद ज्ञानपीठ के तत्वावधान में श्री दिगंबर जैन मंदिर, उदासीन आश्रम परिसर में शनिवार का पूरा दिन आध्यात्मिक विमर्श, प्राचीन ज्ञान और ऐतिहासिक तथ्यों के मंथन को समर्पित रहा। द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के पहले दिन के तीसरे एवं अंतिम सत्र में “सत्यता की कसौटी पर सिरि भूवलय” विषय पर देशभर के विद्वानों ने अपने विचार रखे।
मुनि श्री का सारगर्भित संदेश
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्यसागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि “चर्चाएं चलती रहती हैं, तभी संबंध जीवित रहते हैं। लेकिन व्यक्ति के अंतिम समय के बाद उसकी पहचान उसके आचरण और व्यवहार से होती है।”
उन्होंने स्पष्ट कहा कि ज्ञान आवश्यक है, पर यदि वह अहंकार का कारण बन जाए, तो आत्मकल्याण में बाधा भी बन सकता है।
आचरण और व्यवहार पर विशेष जोर
मुनि श्री ने अपने उद्बोधन में आचरण और व्यवहार की समेकित व्याख्या करते हुए कहा कि केवल शास्त्र ज्ञान ही पर्याप्त नहीं, उसे जीवन में उतारना ही सच्ची साधना है।
प्राकृत भाषा को जन-जन तक पहुँचाने का आह्वान
उन्होंने यह भी कहा कि प्राकृत भाषा को आमजन तक पहुँचाने के लिए वर्तमान प्रचलित भाषाओं के साथ प्रयोग जरूरी है, ताकि प्राचीन ज्ञान नई पीढ़ी से जुड़ सके।
विद्वानों ने रखे तार्किक विचार
सत्र की अध्यक्षता नलिन के शास्त्री ने की, जबकि जयकुमार उपाध्ये सारस्वत अतिथि रहे।
इस अवसर पर डॉ. अनुराग मेहता, रश्मि जैन, उमंग जैन, पूर्णिमा जैन, पुष्पेंद्र जैन सहित अनेक विद्वानों ने सिरि भूवलय पर अपने तार्किक और शोधपरक विचार प्रस्तुत किए।
मंचासीन अतिथि एवं सम्मान
कार्यक्रम का संचालन रंजना पटोरिया ने किया। मंच पर ट्रस्ट अध्यक्ष अमित कासलीवाल, टी.के. वेद, डी.के. जैन (डीएसपी), डॉ. अनुपम जैन, आजाद जैन बीड़ी वाला परिवार, अशोक खासगीवाला सहित अन्य गणमान्य अतिथि उपस्थित रहे। इस अवसर पर मंचासीन अतिथियों का सम्मान भी किया गया।
जब ज्ञान आचरण बन जाए, तभी सिरि भूवलय जैसे ग्रंथ जीवन की दिशा तय करते हैं।













Add Comment