जैन परंपरा में दिवाली पर्व का विशेष महत्व है। यह दिन भगवान महावीर स्वामी के निर्वाणोत्सव के रूप में मनाया जाता है। ईसा से 527 वर्ष पूर्व कार्तिक कृष्ण अमावस्या को भगवान महावीर का निर्वाण हुआ था। इसके अगले दिन, कार्तिक शुक्ल एकम से जैन परंपरा में नए वर्ष की शुरुआत मानी जाती है। इस दिन दीपक जलाने की परंपरा भी जुड़ी हुई है। दीपक केवल बाहरी अंधकार को मिटाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह मानव अंतर में व्याप्त अज्ञान और निराशा को दूर कर जीवन में ज्ञान, आशा और आलोक का प्रतीक बनता है। पढ़िए डॉ. सुनील जैन संचय का विशेष आलेख…
भारत धर्मप्रधान देश है और अहिंसा प्रधान संस्कृति का प्रतीक है। हमारे त्योहार संस्कृति एवं सभ्यता का दर्पण हैं और इनका संबंध प्राचीन महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ा होता है। यहां पर धार्मिकता से जुड़े अनेक पर्व मनाए जाते हैं। दीपावली पर्व पूरे देश में बड़े उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। अधिकतर धर्म-संप्रदायों में इस पर्व को मनाने का कोई न कोई उद्देश्य अवश्य होता है।
भारत में संवतों की विविधता
भारत में वीर निर्वाण संवत, विक्रम संवत, शक संवत, शालिवाहन संवत, ईस्वी संवत, गुप्त संवत, हिजरी संवत आदि कई संवत प्रचलित हैं। इनमें से वीर निर्वाण संवत सबसे प्राचीन है। यह हिजरी, विक्रम, ईस्वी, शक आदि संवतों से भी अधिक पुराना है।
जैन परंपरा में दीपावली
जैन दर्शन में दीपावली पर्व का इतिहास अनूठा और तथ्यपरक है। यह पर्व भगवान महावीर स्वामी से जुड़ा हुआ है। ईसा से 527 वर्ष पूर्व कार्तिक कृष्ण अमावस्या को दीपावली के दिन ही भगवान महावीर का निर्वाण हुआ। इसके अगले दिन कार्तिक शुक्ल एकम से भारत का सबसे प्राचीन संवत ‘वीर निर्वाण संवत’ प्रारंभ हुआ। जैन परंपरा में इसी दिन से नए वर्ष की शुरुआत मानी जाती है।
वीर निर्वाण संवत का प्रमाण
वीर निर्वाण संवत की प्रामाणिकता सुप्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने वर्ष 1912 में अजमेर जिले के बडली गाँव (भिनय तहसील, राजस्थान) से प्राप्त प्राचीन प्राकृत ब्राह्मी शिलालेख से सिद्ध की। इस शिलालेख में लिखा है “84 वीर संवत”, जो भगवान महावीर निर्वाण के 84 वर्ष बाद लिखा गया। यह शिलालेख अजमेर के राजपूताना संग्रहालय में सुरक्षित है।
शिलालेख की पहली पंक्ति में “वीर” शब्द भगवान महावीर स्वामी को संबोधित है और दूसरी पंक्ति में “निर्वाण से 84 वर्ष” अंकित है। ईसा से 527 वर्ष पूर्व निर्वाण से 84 वर्ष घटाने पर 443 वर्ष आता है, जो इस शिलालेख के लिखे जाने का वर्ष है।
दीपावली और जीवन का आलोक
दीपावली पर जलने वाले दीपकों की संख्या हजारों में होती है। यह बाहरी अंधकार को मिटाता है, लेकिन अंतर का अंधकार यथावत् रहता है। इस दीपावली पर एक दीपक इस अनुभूति के साथ जलाना चाहिए कि आत्मा की ज्योति मरणशील देह में मुस्कुराए।
जैन परंपरा में नया वर्ष
जैन परंपरा में भगवान महावीर स्वामी के निर्वाणोत्सव के अगले दिन से नए वर्ष की शुरुआत मानी जाती है।
“यद्यपि युद्ध नहीं कियो, नाहिं रखे असि-तीर,
परम अहिंसक आचरण, तदपि बने महावीर।”













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