श्रीमद 1008 श्री चंद्रप्रभु भगवान का 5 दिवसीय पंच कल्याणक श्रीजी की रथ यात्रा से आरंभ हुआ। आचार्य संघ के सानिध्य में घटयात्रा निकाली गई। ध्वजारोहण, मंडप उदघाटन के साथ कलश स्थापना की गई। याग़ मंडल विधान से कार्यक्रम आरंभ हुआ। इस दौरान आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने केशलोचन किए। पीपल्दा से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…
पीपल्दा। श्री मज्जिनेंद्र पंचकल्याणक के प्रथम दिन श्री वर्धमान सागर जी के संघ सानिध्य में शुक्रवार से 2 दिसंबर तक चलने वाले 5 दिवसीय श्री चंद्रप्रभु भगवान का पंचकल्याणक का शुभारंभ श्रीजी की रथयात्रा के साथ हुआ। इसमें सौधर्मइंद्र समर पूर्वा कंठाली और ध्वजारोहण परिवार हाथी पर सवार रहे। शताधिक महिलाओं की विशाल घटयात्रा नवीन जिनालय से प्रारंभ होकर नगर के प्रमुख मार्गों से होते हुई चंद्रपुरी के वर्धमान सभागृह पहुंची। इस अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने प्रवचन में बताया कि चंद्रपुरी में चंद्रनाथ तीर्थंकर बालक ने जन्म लेकर, वैराग्य दीक्षा तप साधना से परमात्म पद को जानने का आदर्श कार्य कर परमात्मा बनने का पुरुषार्थ किया। नगर में मंदिर जिनालय बनने से नगर उन्नतिशील होता है।
भगवान के दर्शन, अभिषेक पूजन आदि क्रियाओं से जीवन मंगलमय होकर जीवन में उन्नति होती है। 15 माह तक देवता रत्नों की वृष्टि करते हैं। तीर्थंकर धर्म की वृष्टि उपदेश देशना से करते हैं। 3 वर्षों में नूतन मंदिर निर्मित हो गया। आचार्य श्री ने कहा कि देव शास्त्र गुरुओं के सेवा भावियों का सम्मान करना भारतीय संस्कृति है। पंच कल्याणक के संस्कार क्रिया से जीवन का निर्वाण का पुरुषार्थ कर जीवन का निर्माण करे।
पंचकल्याणक प्रतिष्ठा देखने के साथ सीखने का महोत्सव
आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज के प्रवचन के पूर्व शिष्य मुनि श्री हितेंद्रसागर जी ने बताया कि पंचकल्याणक प्रतिष्ठा में पाषाण, रत्न ,धातु की प्रतिमा में प्रतिष्ठाचार्य के सहयोग से आचार्य मुनिराज मंत्रोच्चार से सूरीमंत्र से प्रतिमाओं में भगवान के गुणों का आरोपण कर प्रतिमाओं को पूजनीय, वंदनीय बनाया जाता है। मुनि श्री ने आगे प्रवचन में बताया कि पंचकल्याणक प्रतिष्ठा देखने के साथ सीखने का महोत्सव है। किस प्रकार पाषाण को पूजनीय बनाया जाता है। पंचकल्याणक प्रतिष्ठा से भगवान जैसा बनने का पुरुषार्थ करें। यह भाव जागृत करें कि हम भी किसी भव में तीर्थंकर नाम कर्म प्रकृति का बंध करें। आज प्रातः आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने केश लोचन किए। आचार्य श्री का उपवास रहा। समाज अध्यक्ष बजरंगलाल एवं मनोज जैन सोगानी ने बताया कि आचार्य श्री प्रवचन के पूर्व ध्वजारोहण श्रेष्ठी सन्मति, कमलेश देवी, सुकुमाल, महिपाल, मोहित चवरिया परिवार ने, मंडप उद्घाटन राजेंद्र दिलीप अंकित अमित निवाई ने, मुख्य मंगल कलश स्थापना मनोज जैन सोगानी परिवार ने की।
इन समाजजनों का किया गया सम्मान
आचार्य श्री संघ के मंचासीन होने के बाद मंगलाचरण द्वारा श्रीजी और प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी सहित परंपरा के सभी आचार्यों के चित्र का अनावरण महावीर, शिखरचंद, सुरेश,अशोक परिवार निवाई तथा दीप प्रवज्जलन कैलाश चंद चोरू परिवार ने किया। श्री जी के अभिषेक के बाद आचार्य श्री सानिध्य में संघ के सेवाभावी बाल ब्रह्मचारी गज्जूभैया, पदम भैया, सोनू भैया, परमीत, पारस पाटनी, बाबूलाल शाह, लोकेश गजराज, फूलसिंह, सनत जैन का तिलक ,श्रीफल, माला पगड़ी से सम्मान किया गया। मंदिर के शिल्पकार, वास्तुविद प्रतिमाधारी इंजीनियर पारसमल उदयपुर का सम्मान किया गया। वात्सल्य वारिधी सोशल मीडिया के राष्ट्रीय प्रभारी राजेश पंचोलिया इंदौर का सभी प्लेटफॉर्म इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया पर त्वरित प्रसारण प्रचार-प्रसार के लिए सम्मान किया गया। आचार्य ओर प्रतिष्ठाचार्य निमंत्रण द्वारा प्रतिष्ठाचार्य पंडित मनोज शास्त्री सहित सभी विद्वानों का बहुमान किया। आचार्य श्री के चरण प्रक्षालन कर जिनवाणी पुण्यार्जक परिवारों द्वारा भेंट की गई।
16 सपनों के नाटक का मंचन किया गया
पंचकल्याणक प्रतिष्ठा कार्यक्रम के अध्यक्ष मनोज सोगानी ने बताया कि दोपहर को सौधर्म इंद्र ,शचि इंद्राणी, माता पिता प्रमुख इंद्र, प्रति इंद्र सहित सभी का मंत्रोच्चार से सकलीकरण किया गया। याग़मंडल की पूजन प्रतिष्ठाचार्य मनोज शास्त्री के निर्देशन में हुई। शाम को श्री जी और आचार्य श्री वर्धमान सागर जी की भव्य मंगल आरती पश्चात रात्रि में भगवान की माता को रात्रि में आए 16 सपनों का नाटकीय मंचन किया गया। 29 नवंबर को तीर्थंकर बालक का जन्म होगा। तीर्थंकर बालक का 1008 कलशों से अभिषेक होगा। सवाई माधोपुर सहित राजस्थान के अनेक नगरों से हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ेगी। सौधर्म इंद्र समर कंठाली द्वारा हेलीकाप्टर से पुष्पवृष्टि होगी।













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