आचार्यश्री सुनील सागर महाराज ससंघ का जगत से पद विहार कर प्रातः 8 बजे मामादेव के सन्मति सुनीलम संत भवन में मंगल प्रवेश हुआ। बुधवार प्रातः आचार्य श्री सुनीलसागर महाराज के मंगल आगमन और संत भवन में आहारचर्या होने से गुरुभक्तों में खुशी है। यहां आचार्यश्री ने धर्मसभा को संबोधित किया। मामादेव से पढ़िए, यह खबर…
मामादेव। आचार्यश्री सुनील सागर महाराज ससंघ का जगत से पद विहार कर प्रातः 8 बजे मामादेव के सन्मति सुनीलम संत भवन में मंगल प्रवेश हुआ। 3 वर्षों पूर्व जैन संतों के रुकने की व्यवस्था नहीं होने से सुनील सागर संघ को जगत-मामादेव के मध्य पहाड़ी पर विश्राम करना पड़ा। जिससे गुरु भक्तों ने संत भवन बनाने का बीड़ा उठाया। श्री पार्श्व पुण्योदय धर्मार्थ एवं सेवार्थ समिति के तत्वाधान में संत भवन के लिए भूमि क्रय करके शिलान्यास कर दानदाताओं के माध्यम से 3 वर्षों में निर्माण कार्य पूर्ण होकर संत भवन बन गया। बुधवार प्रातः आचार्य श्री सुनीलसागर महाराज के मंगल आगमन और संत भवन में आहारचर्या होने से गुरुभक्तों में खुशी की लहर दौड़ पड़ी।
इस अवसर पर संत भवन का लोकार्पण सकल जैन समाज उदयपुर के अध्यक्ष शांतिलाल वेलावत और बीसा नागदा जैन समाज के श्रावकगणों ने किया। धर्मसभा में आचार्य सुनील सागर महाराज ने कहा कि दृढ़ संकल्प, मेहनत और पक्का इरादा अवश्य सफलता दिलाता है। गुरु भक्तों द्वारा जैन संतों के लिए किया गया। संकल्प आज संत भवन के रूप में पूर्णता की ओर है। आचार्य श्री ने कहा कि जरूरत अनुसार स्कूलों के परिसर अथवा आसपास 10 किमी की दूरी में ऐसे संत भवन बनने चाहिए। जिनका उपयोग जैन संतों, पदयात्रियों और बच्चों के पढ़ाई के लिए होना चाहिए।
धर्मसभा में यह समाजजनों ने उपस्थिति दर्ज करवाई
धर्मसभा में उपस्थित मोहनलाल जैन कावा खेड़ी, शांतिलाल वेलावत उदयपुर, प्रकाश कामदार जगत, शांतिलाल जैन जावद, रोशन लाल, शांतिलाल कोटडिया कानपुर सहित दानदाताओं ने संत भवन में दूसरी मंजिल पर कमरे निर्माण के लिए दान राशि की घोषणा की। धर्मसभा में आचार्यश्री सुनीलसागर महाराज का पाद प्रक्षालन, मोहनलाल जैन कावा और प्रकाश कामदार जगत ने किया।
श्रीपार्श्व पुण्योदय धर्मार्थ एवं सेवार्थ समिति के भंवरलाल बदावत, भेरूलाल, कमलेश, पवन बया, धूलचंद वाणावत, उषादेवी जैन सहित जगत, उदयपुर, भिंडर, लकड़वास, कानपुर, खेड़ी, बोरी, बंबोरा सहित सैकड़ों श्रावकगण मौजूद थे। शाम को आचार्यश्री सुनील सागर जी का उदयपुर की ओर मंगल विहार हुआ। आचार्यश्री सुनीलसागर को लकड़वास, कानपुर, चांसदा, भींडर और उदयपुर पधारने के लिए श्रावकों ने श्रीफल भेंटकर निवेदन किया।













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