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भक्ति मार्ग में मीरा का नाम श्रद्धा से आता है : मुनिश्री सारस्वत सागर जी ने प्रवचन में बताया भक्ति का रहस्य 


मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्रुतसागर महाराज जी भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर, नांद्रे में विराजमान हैं। मुनि श्री सारस्वत सागर महाराज जी ने अपने प्रवचन में भक्ति आत्म समर्पण के बारे बताया। नांद्रे से पढ़िए, अभिषेक अशोक पाटील की यह खबर…


नांद्रे। पट्टाचार्य विशुद्धसागर महाराज जी के शिष्य मुनि श्री सारस्वत सागर जी महाराज, मुनि श्री जयंत सागर जी महाराज, मुनि श्री सिद्ध सागर जी महाराज और क्षुल्लक श्रुतसागर महाराज जी भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर, नांद्रे में विराजमान हैं। मुनि श्री सारस्वत सागर महाराज जी ने अपने प्रवचन में भक्ति आत्म समर्पण के बारे में कहा कि जीवन में श्रद्धा श्रद्धेय संबंध गुणियों के साथ होना चाहिए। यदि हम गुणियों को अपने जीवन का आदर्श मानते हैं तो हम भी गुणवाण बन सकते हैं और यदि अवगुणियों को मानते हैं तो हम अवगुणी बन सकते हैं। जैसा श्रद्धा का पात्र, आस्था का पात्र करेगा, वैसा आप करेंगे। इसलिए ज्ञानियों को अपना आत्म समर्पण गुण अवगुण की परीक्षा करके करना चाहिए। जब किसी के प्रती हमारी भक्ती होती है तो उसमें स्वयं के अस्तित्व से शून्य होना पडता है अर्थात स्वयं को भुलना होता है।

जो अपने अस्तित्व को कायम रखना चाहते हैं वे कभी भी विनयवान नहीं हो सकते और न ही वे भक्त बन सकते हैं। भक्ति मार्ग में मीरा का नाम आता है। मीरा कृष्ण के लिए पागल हो गई थी, उसको तो मात्र दिन-रात कान्हा-कान्हा ही दिखते थे। वह अपने शरीर को छोड कान्हा में ही रमी रहती थी। मीरा भक्ति की शक्ती से भोजन करती। वह किंचित भी अपने शरीर पर ध्यान नहीं देती थी। वह अपने आपको भूल गई थी कि मैं मीरा हूं। मैं कोई स्त्री हूं, मैं किसी कि पुत्री हूं या किसी की बहन हूं, मैं तो मात्र कृष्ण की दिवानी हूं, बाकी मैं कुछ भी नहीं हूं।

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