समाचार

मनुष्य जीवन में वैराग्य, व्रत संयम का पालन कर धर्म धारण करना चाहिए : रत्नत्रय, धर्म समागम, वैराग्य से संवेग भावना उत्पन्न होती हैं 


15 अगस्त को देश स्वतंत्र हुआ है। इससे यह संदेश और प्रेरणा मिलती है कि हमारी आत्मा भी अनेक भवों में कर्मों के अधीन होकर विश्व, संसार में घूम रही है। उसे भी स्वतंत्र कराना है। श्रीमद् जैन धर्म सभी ने प्राप्त किया है श्रीमद् जैन धर्म सुख और शांति का पिटारा है। टोंक से पढ़िए, राजेश पंचोलिया की यह खबर…


टोंक। 15 अगस्त को देश स्वतंत्र हुआ है। इससे यह संदेश और प्रेरणा मिलती है कि हमारी आत्मा भी अनेक भवों में कर्मों के अधीन होकर विश्व, संसार में घूम रही है। उसे भी स्वतंत्र कराना है। श्रीमद् जैन धर्म सभी ने प्राप्त किया है, श्रीमद् जैन धर्म सुख और शांति का पिटारा है। अभी आप संवेग भावना की विवेचना 16 कारण भावना अंतर्गत मुनि श्री ने की। 16 कारण भावना में सम्यक दर्शन को दर्शन, शील विनय आदि भावना का पालन कर व्रतों की दोष भय रहित पाप रहित करना होगा हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह 5 पापों का त्याग महाव्रती और अणुव्रती दोनों करते हैं, क्योंकि पाप ही संसार परिभ्रमण का कारण है। यह वैराग्य भी होने देता। यह मंगल देशना राजकीय अतिथि आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने 16 कारण भावना अंतर्गत धर्मसभा में प्रकट की।

पेंसिल के एक डॉट बराबर भी जीव में आत्मा होती है

आचार्य श्री ने आगे आत्मा की विवेचना कर बताया कि पापों के कारण आत्मा को भी कष्ट होता है। आप शरीर को ही अपनी आत्मा मानते हैं। आत्मा का स्वभाव भूल रहे हैं। पेंसिल के एक डॉट बराबर भी जीव में आत्मा होती है। सभी महाव्रती अणुव्रती भी अहिंसा का पालन करते हैं। सभी को पांच पापों से भयभीत होना चाहिए। 16 कारण भावना, 12 भावना आदि के चिंतन से आप पापों से बच सकते हैं। अनित्य, अशरण भावना संसार की नश्वरता को बताती है। आपका लक्ष्य आत्म हित के बजाय संसार वृद्धि और भौतिक उपलब्धि से है।

नित्य हमेशा डरना भयभीत होना ही संवेग भावना है

सम्यक दर्शन, ज्ञान, चारित्र,धर्म समागम ओर वैराग्य से संवेग भावना उत्पन्न होती हैं । रत्नत्रय बहुमूल्य रत्न है। आचार्य श्री ने करुणा पूर्वक उपदेश में बताया कि आप असली रतन को भूलकर उपेक्षा कर ग्रहदोष पीड़ा दूर करने के लिए हाथों में उंगलियों में नकली रत्न पहनते हैं। धर्म और तप त्याग से आपकी आत्मा भी परमात्मा बन सकती हैं संसार से दुखो से घबरा कर धर्म का चिंतन और स्वरूप समझ कर दीक्षा ली जाती हैं। महत्वपूर्व सूत्र में बताया कि निर्दाेष रीति से विधि विनयपूर्वक स्वाध्याय करने वाले को उपवास का फल मिलता है। आपके भाव ओर परिणाम अनुसार गति मिलती है। आचार्य श्री के प्रवचन के पूर्व मुनि श्री चिंतन सागर जी ने अपने चिंतन में बताया कि संसार के दुखों से नित्य हमेशा डरना भयभीत होना ही संवेग भावना है। संसार दुखों का सागर है।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
1
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page