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अक्षय फलदायक अक्षय तृतीया पर दान और आहार का महत्व: दान देकर राजा श्रेयांस ने अक्षय पुण्य किया प्राप्त 


अक्षय तृतीया को जैन धर्म के अनुसार अक्षय पुण्यदायी माना गया है। इस दिन तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को आहार प्राप्त हुआ था। यह पर्व जितना जैन धर्म के लिए महत्व का है उतना ही हिन्दु धर्म में भी इसका महत्व अक्षय बताया गया है। आइए जानते हैं अक्षय तृतीया के बारे में क्यों है इसका इतना महत्व। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष प्रस्तुति में संपादक रेखा संजय जैन की कलम से…


इंदौर। कहते हैं कि जिस दिन उदयकाल में तृतीया हो उसी दिन अक्षय तृतीया का उत्सव संपन्न करना चाहिए। दान देना, पूजा करना, अतिथि सत्कार करना जैसे विधेय कार्यों को अक्षय तृतीया तिथि में करना चाहिए। जैन धर्म के अनुसार जिस दिन ऋषभदेव को आहार हुआ उस दिन वैशाख शुक्ल तृतीया थी। हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस के यहां उस दिन रसोईगृह में भोजन अक्षीण यानी समाप्त न होने वाला हो गया। अतः इसे आज भी लोग अक्षय तृतीया पर्व कहते हैं। भरत क्षेत्र में इसी दिन से दान की प्रथा प्रचलित हुई। इसीलिए यह पर्व जैन समाज की भांति हिन्दू समाज में भी मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि तीर्थंकर मुनि को प्रथम बार आहार देने वाला दाता उसी पर्याय से या तीसरे पर्याय से मोक्ष प्राप्त करता है। कुछ लोगों की ऐसी भी मान्यता है कि तीर्थंकर को मुनि अवस्था में दान देकर राजा श्रेयांस ने अक्षय पुण्य, जिसका फल मोक्ष-प्राप्ति है, प्राप्त किया था, अतः यह तिथि अक्षय तृतीया कहलाती है।

सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त

अक्षय तृतीया को लोग बिना लग्न-संशोधन के भी प्रायः सभी शुभ कार्य यथा नवीन मकान, दुकान या अन्य नए कार्य का मुहूर्त करने में गौरव मानते हैं। कुछ स्थानों पर इस दिन मिट्टी के नए घड़ों का मुहूर्त करने की परंपरा है। उनके मुंह पर मिष्ठान एवं पकवान रखा जाता है, जिसे बाद में दान कर दिया जाता है। इस प्रकार आहार दान के साथ इस पर्व की मान्यता जुड़ी हुई है।

प्राचीन कथा है साक्षी

प्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल तृतीया को अक्षय तृतीया पर्व मनाया जाता है। इस दिन प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव ने निर्ग्रन्थ अवस्था में हस्तिनापुर के राजा श्रेयांस के यहां आहार लिया था, तभी से उनके निमित्त से यह पर्व प्रारंभ हुआ।

आहार दान की महिमा

जब ऋषभदेव संसार, शरीर और भोगों से विरक्त हो तप और मौन साधना करने के बाद आहार के लिए नगर और ग्रामों में विहार करने लगे, कोई भी अज्ञानता के कारण विधि पूर्वक उन्हें आहार नहीं देता था। छह माह बाद पुनः आहार के लिए हस्तिनापुर आते हुए दूर से ही देखकर राजा श्रेयांस को अपने पूर्व जन्म का स्मरण हो गया। इस भव से आठ भव पहले भगवान् ऋषभदेव वज्रजंघ नाम के राजा थे और श्रेयांसकुमार का जीव उनकी रानी श्रीमती था। एक बार राजा वज्रजंघ ने वन में दमधर और सागरसेन नामक मुनिराज को आहार दिया था। उस आहार दान के प्रभाव से देवों ने पंचाश्चर्य किए थे।

चांद्रीचर्या से विचरण करते हुए भगवान ऋषभदेव को श्रेयांस ने उच्चासन पर विराजमान कर सर्व प्रकार वंदन कर इक्षुरस से भरा हुआ कलश उठाकर कहा कि हे प्रभो! यह इक्षुरस सोलह उद्गम दोष, सोलह उत्पादन दोष, दश एषणा दोष तथा धूम, अंगार, प्रमाण और संयोजना इन चार दाता संबंधी दोषों से रहित एवं प्रासुक है, इसे ग्रहण कीजिए।

पंचाक्षर की प्राप्ति

राजा श्रेयांस ने कल्याणकारी श्री जिनेंद्र रूपी पात्र को आहारदान किया। इसलिए पांच प्रकार की आश्चर्यजनक विशुद्धियों से ये पंचाश्चर्य प्राप्त हुए। 1-रत्नवृष्टि, 2-पुष्पवृष्टि, 3-दुन्दुभिवाद्य का बजना, 4-शीतल और सुगन्धित मन्द-मन्द वायु का चलना, 5-अहो दानम्ष् इत्यादि प्रशंसा वाक्य। अर्चित होने के बाद जब तीर्थंकर ऋषभदेव तप की वृद्धि के लिए वन को चले गए तब देवों ने राजा श्रेयांस की पूजा की। देवों से समीचीन दान और उसके फल की घोषणा सुनकर भरत आदि राजाओं ने भी आकर राजा श्रेयांस की पूजा की।

दान संबंधी पुण्य का संग्रह

पूर्व घटना का स्मरण कर राजा श्रेयांस ने जो दानरूपी धर्म विधि चलाई उस दान का प्रत्यक्ष फल देखने वाले भरत आदि राजाओं ने बड़ी श्रद्धा के साथ श्रावण किया। राजा श्रेयांस ने बताया कि दान संबंधी पुण्य का संग्रह करने के लिए 1- अतिथि का पतिग्रह 2- उच्च स्थान पर बैठाना, 3- पाद-प्रक्षालन करना, 4-दाता द्वारा अतिथि की पूजा करना, 5- नमस्कार करना, 6-मनः शुद्धि, 7-वचन शुद्धि, 8-काय शुद्धि और 9-आहार शुद्धि ये नवधा भक्ति नौ प्रकार जानने योग्य हैं। दान देने से जो पुण्य संचित होता है वह दाता के लिए स्वर्गादि फल देकर अंत में मोक्षफल देता है।

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