समाचार

अधीरता एक ऐसी ही दुर्बलता है जो अंदर से कमजोरी करती है : मुनिश्री प्रमाण सागरजी ने भोपाल में धर्मसभा में दिए उपदेश 


मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने अधीरता विषय पर मार्गदर्शन देते हुए अवधपुरी के विद्यासागर इंस्टीट्यूट में उपदेश दिए। उन्होंने अधीरता के स्वरुप, कारण, परिणाम तथा समाधान इन चार बातों पर चर्चा की। भोपाल से पढ़िए अविनाश जैन और अभिषेक जैन की यह खबर…


भोपाल। जीवन की स्थायी उन्नति के लिये धैर्य रखना जरुरी है। जो अधीर होता है। वह कभी भी अपने जीवन में उन्नति नहीं कर सकता। अधीरता से तो बने बनाये काम भी बिगड़ जाते हैं। यह उदगार मुनिश्री प्रमाणसागर महाराज ने अधीरता विषय पर मार्गदर्शन देते हुए अवधपुरी के विद्यासागर इंस्टीट्यूट में व्यक्त किए। मुनि श्री ने कहा जो अधीर है। वह धैर्य से पहले ही हार मान लेता है। आजकल प्रतीक्षा तो आदमी करना ही नहीं चाहता। समय से पहले ही रिजल्ट चाहता है। खेत में आज बीज बोया है तो अंकुर फूटने में समय तो लगेगा ही लेकिन, अधीरता से वह रोज-रोज उस बीज को देखता है और इस हड़बडी में बीज अंकुरित न होकर नष्ट ही हो जाता है। मुनि श्री ने कहा कि कोई भी कार्य हो वह अपने निर्धारित समय से ही पूर्ण होगा तुम कितने ही अधीर हो जाओ पेड़ फलेगा तो वह ऋतु चक्र के अनुरुप फलेगा तुम उसके लिये कितना भी प्रयास करो वहा कुछ होंने वाला नहीं।

यह बात अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए। मुनि श्री ने कहा अधीरता एक ऐसी ही दुर्बलता है,जो हमें अंदर से कमजोर करती है। हमारे चित्त को उद्विग्न और बैचेन करती है, जबकि मन में जब धैर्य होता है तो वहा निश्चिन्तता होती है। उन्होंने अधीरता के स्वरुप, कारण, परिणाम तथा समाधान इन चार बातों पर चर्चा की। अधीर मन से सफलता नहीं मिलती। उसके लिए प्रतीक्षा करना पड़ती है उदाहरण देते हुए कहा कि एक व्यक्ति ने अपने नये व्यवसाय की शुरुआत की और उसका व्यापार अच्छा चला। उसने उसी आधार पर साल भर का बजट बना लिया लेकिन, बीच में व्यापार कमजोर हो गया तो वह अधीर हो उठा कि मेरा व्यापार नहीं चल रहा और इससे वह डिप्रेशन का शिकार हो गया।

अविवेक पूर्ण निर्णय ने उपकारी के प्राण ले लिए

मुनि श्री ने कहा कि हड़बड़ी से ही गड़बड़ी होती है अभी तुमने व्यापार की शुरुआत की है थोड़ी प्रतीक्षा तो करो, किसी भी कार्य में अपेक्षा रखो लेकिन अति अपेक्षा न रखो, अतिअपेक्षा से धैर्य टूटता है और बना बनाया कार्य भी बिगड़ जाता है। एक उदाहरण के माध्यम से महाराज श्री ने बताया की एक व्यक्ति बेटी के संबंध के लिये परेशान था। हमारे पास आया तो हमने कहा कि आप अपना पुरुषार्थ तो कर रहे हो जब उसका निमित्त आएगा तो उसका संबंध भी हो जाएगा। अधीरता से तो बने बनाये काम भी बिगड़ जाते है। मुनि श्री ने कहा कोई कार्य भय या उतावले पन से काम नहीं होता उन्होंने कहा कि आप सभी लोगों ने सांप और नेवला की कहानी तो पड़ी ही होगी। जिसमें नेवला परिवार का अंग था। गृह मालकिन अपने बच्चे को उसके भरोसे छोड़कर पानी भरने जाती है इस बीच एक सांप उधर आकर बच्चे की ओर बढ़ता है तो नेवला उस सांप का काम तमाम कर देता है और वह घर की चौखट पर मालकिन इंतजार करता है। इधर गृह मालकिन आती है और नेवला के मुख पर खून लगा देख उसे कुछ शंका होती है और आव न देखा ताव वह पानी का घड़ा उस नेवला पर पटक देती है। जिससे उसके तुरंत प्राण पखेरू उड़ जाते हैं और जब वह अंदर पहुंच कर देखती है कि उसका बच्चा तो खेल रहा है और पास में एक भयानक विषधर के टुकड़े-टुकड़े होकर पड़े है तो वह स्थिति को समझ अपने आपको पश्चाताप करती है कि उसके अधीरता और अविवेक पूर्ण निर्णय ने उसके उपकारी के प्राण ले लिए।

अधीरता से संबंधों में खटास उत्पन्न हो जाती है

मुनि श्री ने कहा कि आप लोगों के जीवन में भी कही बार ऐसी स्थिति आती है, कोई भी कार्य हड़बड़ी में करने के पश्चात असफलता पर मन को बहुत तकलीफ होती है उन्होंने कहा कि कोई भी बात हो सोच समझकर बोलो विवेक से बोलो जो अतिरेक में अपने शब्दों का प्रयोग करते है वह अपना ही नुकसान करते है,अधीरता में लिया गया निर्णय प्रायःपश्चाताप का ही कारण बनता हैष् अधीरता से संबंध बिगड़ते है नई नई शादी हुई पति ने अधीरता दिखाई और पत्नी के सामने बहुत सी अपेक्षा रख दी और उन अपेक्षा की पूर्ति न होने पर शादी के दो माह में ही पत्नी अपने घर जाकर बैठ गई और स्थिति यह हुई कि दोनों के बीच तलाक हो गया। व्यापार व्यवसाय घर या रिश्तेदारी में अधीरता से संबंधों में खटास उत्पन्न हो जाती है, बात-बात पर अपने बच्चों को डांटिए मत धैर्य से बच्चों को समझा कर अपनी समझदारी का परिचय दीजिए। जिससे आपको पछताना न पड़े।

सफलता में समय और उसकी प्रतीक्षा करो

कभी-कभी आपकी अधीरता आपको तो मानसिक रुप से कष्ट देती ही है। परिवार को भी नष्ट कर देती है। उन्होंने कहा गृहस्थी हो या साधना का क्षेत्र हो धैर्य रखना बहुत जरूरी है। अधीरता में मानसिक प्रगति रुक जाती है। सदैव इस बात को अपना सूत्र बनाइये। ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मां फलेषु कदाचनं’ मेरे हाथ में प्रयत्न है। प्रयत्न में कोई कमी नहीं करो, कार्य शिद्दत से करो,परिणाम पर बैचेनी नहीं। सफलता में समय और उसकी प्रतीक्षा करो रोटी खाने से खून बनता है लेकिन, रोटी खाते ही खून नहीं बनता। उन्होंने प्रयोग बताते हुए कहा कि जब भी मन में अधीरता हो तो गहरी सांस लो और रुकें तथा धीरे-धीरे छोड़ें। इससे आपकी अधीरता में कमी आएगी। हम चीजों के लिए थोड़ा समय दें और प्रतिक्रिया करने से बचें। धीरज तथा संयम के साथ यदि अपने से आत्म संवाद करें इससे आपका अवचेतन मन सक्रिय हो उठेगा और आपके अंदर की अधीरता नष्ट हो जाएगी।

आप को यह कंटेंट कैसा लगा अपनी प्रतिक्रिया जरूर दे।
+1
0
+1
0
+1
0
Shreephal Jain News

About the author

Shreephal Jain News

Add Comment

Click here to post a comment

You cannot copy content of this page