सोमवार की बेला में श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर प्रवचन सभा में आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज संघस्थ मुनि श्री प्रांजल सागरजी महाराज ने आत्मा एवं गुरु का महत्व समझाया। रामगंजमंडी से पढ़िए, अभिषेक जैन लुहाड़िया की यह खबर…
रामगंजमंडी। सोमवार की बेला में श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर प्रवचन सभा में आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी महाराज संघस्थ मुनि श्री प्रांजल सागरजी महाराज ने आत्मा एवं गुरु का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि यदि आत्मा को समझना चाहते हैं तो गुरु को समझो। देव शास्त्र गुरु के प्रति समर्पित रहोगे तो आत्मा का चिंतन अपने आप हो जाएगा देव शास्त्र गुरु को समझो। उन्होंने कहा जो आत्मा को जानता है। वह गुरु को जानता है और जो गुरु और आत्मा को जानता है। वह परमात्मा को जानता है। गुरु महिमा का बखान करते हुए कहा कि गुरु अमृत कल्प वृक्ष हैं। जिससे आत्मा में बंधी कालिमा कमजोर पड़ जाती है। इसीलिए गुरु चरणों में आ जाओगे तो सबकुछ होगा।
कर्म की लीला बड़ी विचित्र है-आचार्य श्री विनिश्चय सागरजी
प्रवचन सभा में आचार्य श्री विनिश्चय सागर महाराज ने कहा कि कर्म जब उदय में आते हैं तो बहुत कुछ हो जाता है। कर्म उदय के कारण राम को मिलने वाली राजगद्दी की जगह वनवास हो गया। जिसने सबसे ज्यादा समर्थन किया उसी ने वनवास दे दिया। उन्होंने कहा कि कर्म की लीला बड़ी विचित्र है। कर्म हंसते हुए को रुला देता है और रोते हुए को हंसा देता है। कर्म जब बुरा उदय में होता है तो फिक्र आती नहीं और जब कर्म अच्छा होता है तो सबको फिक्र आती है। तीव्र कर्म का जब उदय होता है तो किसी को फिक्र नहीं होती। जब कर्म का अनुभाग घटने लगता है तो सबको फिक्र होने लगती है। उन्होंने कहा कि हमारे पास बहुत कुछ है फिर भी दिमाग से निकल जाता है कि मेरे पास कुछ नहीं है सुखी होने का सबसे अच्छा उपाय है कि मेरे पास बहुत कुछ है और जितना है बहुत है।
हम शरीर की कीमत करेंगे तो शरीर हमारी कीमत करेगा
शरीर की इतनी कीमत है तो आत्मा की कितनी कीमत होगी। हमें समझने की जरूरत है। हमारी आत्मा की भी कीमत है, हमारी भी कीमत है, हमारी सोच की भी कीमत है और हमारे विचार की भी कीमत है। हर चीज की कीमत है। सबसे ज्यादा कीमत तो उसकी है, जो आपके अंदर धर्म विराजमान है जो बहुमूल्य है। इसमें इतनी ताकत है कि आप सही ढंग से कर लें। उसकी भूमिका बना ले तो जो आपने सोचा नहीं था वह आपको मिल जाएगा। आचार्य श्री ने जैन दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि जैन दर्शन में शरीर द्वारा धार्मिक क्रिया करने को कहा है। उन्होंने ब्रह्म मुहूर्त में पंच परमेष्ठि का ध्यान करने की सभी को सीख दी और कहा कि उसके बाद दैनिक क्रिया के बाद अभिषेक पूजन आदि में संलग्न हो जाए। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि यदि हम शरीर की कीमत करेंगे तो शरीर हमारी कीमत करेगा उन्होंने कहा कि शरीर और आत्मा दोनों का काम दुख से बचाना है। कर्म यदि हम प्रभु की आराधना करते हैं तो अशुभ शुभ में परिवर्तित हो जाते हैं विशुद्धि के साथ करे।













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