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मद को खत्म कर दिया तो भगवान बनने योग्य हो जाओगे: मुनिश्री जयंतसागर जी ने प्रवचन में मद-अहंकार त्यागने पर दिया जोर 


स्थानीय भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में इन दिनों चातुर्मास कर रहे मुनिराजों के नित्य प्रवचन हो रहे हैं। प्रवचन के पूर्व भगवान की पूजा-अर्चना और भक्तिमय आराधना का दौर चल रहा है। इसका बड़ी संख्या में जैन समाज के धर्मानुरागी जन भाग लेकर पुण्य जाग्रत कर रहे हैं। नांद्रे से पढ़िए, यह खबर…


नांद्रे। स्थानीय भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में इन दिनों चातुर्मास कर रहे मुनिराजों के नित्य प्रवचन हो रहे हैं। प्रवचन के पूर्व भगवान की पूजा-अर्चना और भक्तिमय आराधना का दौर चल रहा है। इसका बड़ी संख्या में जैन समाज के धर्मानुरागी जन भाग लेकर पुण्य जाग्रत कर रहे हैं। अखिल भारतवर्षीय दिगंबर जैन युवा परिषद कोल्हापुर के कार्याध्यक्ष अभिषेक अशोक पाटील कोल्हापुर ने कहा कि

पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री सारस्वतसागर जी, मुनि श्री जयंत सागर जी, मुनि श्री सिद्ध सागर जी और क्षुल्लक श्री श्रुतसागरजी भगवान महावीर दिगंबर जैन मंदिर में विराजित हैं। मंगलवार को धर्मसभा में मुनि श्री जयंत सागरजी ने कहा कि व्यक्ति के जीवन में विचार तो बहुत हैं परंतु, विचार उसी के बारे में करता है जिससे प्रीति होती है। जीव कभी भी अपरिचित के बारे में विचार नहीं करता। ऐसा ही हमारा जीवन चल रहा है पर के पीछे।

स्व के बारे में विचार करना भूल जाता है। पर-पर करके जीवन को बर्बाद कर दिया और अहंकार करता है कि मैंने सब किया। मैं ही सब कर रहा हूं। मैं नहीं हूआ तो कुछ नहीं होगा। अरे ! भाई ये आपका भ्रम है और इसी भ्रम में रहकर व्यक्ति मद करता है और मद करते-करते समाप्त हो जाता है। अगर ये मद अहंकार को छोड देता तो पता चल जाता कि कौन किसका होता है इस संसार में। कोई भी किसी का नहीं होता, जहां तक जिस शरीर काया को आप दिन रात सजाते रहते हो, महकाते रहते हो वह शरीर भी आपका नहीं है। एक दिन यह शरीर भी छोड के चला जाएगा और मिट्टी में मिल जाएगा। जीव इस मिट्टी के शरीर में मिट्टी का पदार्थ लगाकर मद करते है कि मैं ही मैं हूं और कोई नहीं है। इस मद को खत्म कर दिया तो सब भगवान बनने योग्य हो जाओगे।

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