रामगंजमंडी में दशलक्षण पर्व के सप्तम दिन परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर जी महाराज ने उत्तम तप धर्म की महिमा पर प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि इच्छाओं को रोकना ही वास्तविक तप है, तप से कर्म का दहन होता है और आत्मा शुद्धि की ओर अग्रसर होती है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…
रामगंजमंडी में दशलक्षण पर्व के सप्तम दिन का आयोजन परम पूज्य आचार्य श्री 108 विनिश्चय सागर जी महाराज के सानिध्य में किया गया। इस अवसर पर तत्वार्थ सूत्र के तीन मंडलों पर अर्ध समर्पित किए गए और मंगल प्रवचन का आयोजन हुआ। कोलकाता से पधारे भक्तों ने आचार्य श्री के चरणों का पद प्रक्षालन करने का सौभाग्य पाया। प्रवचन में आचार्य श्री ने कहा कि उत्तम तप धर्म का अर्थ है शरीर को सुखाना और आत्मा को हरा-भरा करना। लोग अक्सर शरीर को पोषित करते हैं और आत्मा को सुखा देते हैं, जबकि आत्मा की संभाल ही वास्तविक तप है।
उन्होंने बताया कि तप से कर्मों का दहन होता है। कर्म ही हमारे सुख-दुख का कारण है और तप ही वह शक्ति है जो आत्मा को शुद्ध कर स्वतंत्रता प्रदान करती है। गृहस्थ जीवन में भी छोटे-छोटे नियम अपनाकर तप किया जा सकता है, जैसे अपशब्द न बोलने का संकल्प लेना। आचार्य श्री ने कहा कि इच्छाओं को रोकना कठिन कार्य है। इच्छाएं कभी पूरी नहीं होतीं, एक समाप्त होते ही दूसरी शुरू हो जाती है। यही मानसिक तनाव और रोगों का कारण बनती हैं। उन्होंने रावण के उदाहरण से समझाया कि कुछ इच्छाएं कभी पूरी नहीं हो सकतीं, जैसे समुद्र का पानी मीठा करना या सोने में सुगंध भरना।
आचार्य श्री ने 12 प्रकार के तपो का किया उल्लेख
उन्होंने बताया कि शरीर को नुकसान पहुंचाने वाला भोजन करना या अति परिश्रम करना अकाल मृत्यु का कारण बनता है। सावधानी और संयम से मृत्यु को टालना संभव है। आचार्य श्री ने 12 प्रकार के तपो का उल्लेख करते हुए कहा कि सबसे अधिक निर्जरा ध्यान तप में होती है। छोटे-छोटे तप से शुरुआत करके व्यक्ति उपवास और ध्यान जैसे बड़े तप की ओर बढ़ सकता है। दस दिनों का यह पर्व आत्मशक्ति और सद्गुणों को संचित करने का अवसर है, जो वर्षभर ऊर्जा प्रदान करता है। इस धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में जैन समाज के श्रद्धालु उपस्थित रहे।













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