वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि आज के समय में हर व्यक्ति दुःख से ग्रसित है और उसके दुःख का कारण उसकी स्वयं की महत्वाकांक्षाएं हैं। इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता, एक के पूरा होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। पढ़िए यह विशेष रिपोर्ट…
रांची। वासुपूज्य जिनालय के प्रांगण में गणिनी आर्यिका विभाश्री माताजी ने अपने प्रवचन में कहा कि आज के समय में हर व्यक्ति दुःख से ग्रसित है और उसके दुःख का कारण उसकी स्वयं की महत्वाकांक्षाएं हैं। इच्छाओं का कोई अंत नहीं होता, एक के पूरा होते ही दूसरी इच्छा जन्म ले लेती है। इच्छा, कामना, लालसा महत्वाकांक्षा ये सब ही तृष्णा के पर्यायवाची हैं। इन्हीं कारणों से व्यक्ति अनीति और अधर्म के मार्ग को अपनाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को विशेष समझता है।
पंचमकाल में व्यक्ति और चालाक होते जाएंगे और जितने ज्यादा चालाक होते जाएंगे, उतने ज्यादा दुखी रहेंगे। प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को अपनी सीमा से ज्यादा होशियार समझता है। जितनी तीव्र कषाएं होंगी, व्यक्ति उतना ज्यादा पीड़ाओं से ग्रसित होता जाएगा। किसी से नाराज होने की जरूरत नहीं है। जब तक हमारे अंदर सरलता और सहजता नहीं आएगी, तब तक हमारे सुख के रास्ते खुलने वाले नहीं है।
किसी से बैर – भाव नहीं बांधना चाहिए
उन्होंने कहा कि इस संसार में कोई किसी को कुछ नहीं देता है। जो भी मेरा अच्छा – बुरा हो रहा हो वह मेरे ही पूर्व में किए गए कर्मों का फल है। यदि कोई मेरे लिये अच्छा कर रहा है तो ये मेरे पुण्य का फल है और यदि कोई मेरा बुरा कर रहा है तो ये मेरे ही पाप का फल है। किसी से नाराज होने की जरूरत नहीं, किसी से राग -द्वेष करने की जरूरत नहीं, द्वेष करने से हमारी दुर्गति ही होती है।
किसी से बैर – भाव नहीं बांधना चाहिये। दुर्जनों की सम्पत्ति दुर्गण हुआ करते हैं क्योंकि दुर्जन दुर्गण को ग्रहण करते हैं और सज्जन व्यक्ति दूसरों के गुणों को ग्रहण करते हैं और सज्जन व्यक्ति दूसरों के गुणों की कथाएं कहा करते हैं। हम जब अपनी हजारों गलतियों को माफ करके अपने से प्रेम कर सकते हैं तो क्या हम दूसरों की गलतियों को क्षमा करके उनसे प्रेम नहीं कर सकते। अपनी गलतियों को राई के समान मानते हैं और दूसरों की गलतियों को पहाड़ के समान मान लेते हैं। पर निन्दा करना, अपनी प्रशंसा करना नीच गोत्र के आश्रव का कारण है।













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