साइंस ऑफ लिविंग सत्र में मुनि निरंजन सागर ने कहा कि हम में और भगवान में बस इतना ही अंतर है कि भगवान उन सभी कर्मों को नष्ट कर चुके हैं जो हमारे अंदर विद्यमान हैं। हमने कितने जन्म लिए कितने जीवन लिए पर किया क्या? मात्र कर्म बंध इस अनंत संसार का अनुबंध और फिर वही संसार के संबंध। पढ़िए जयकुमार जैन जलज हटा /राजेश रागी बकस्वाहा की विशेष रिपोर्ट…
कुण्डलपुर। मुनि श्री निरंजन सागर महाराज ने साइंस ऑफ लिविंग सत्र में कहा कि इस सफर में हम सभी को थोड़ा रंगने का प्रयास करेंगे। परंतु हम जिस रंग में आपको रंगने जा रहे हैं, वह रंग सामान्य नहीं है। ना ही उस रंग का कोई मोल है, ना ही उस रंग का कोई रंग है अर्थात वह रंग-रंग तो है पर रंग होकर भी वह बेरंग है। वह ऐसा रंग है, जिसका कोई रूप नहीं है पर वह आपको अपने आत्मस्वरूप तक पहुंचाने की सामर्थ्य रखता है। ऐसे रंग की होली आज तक जिसने खेली है, उसको फिर संसार की होली खेलने की कोई आवश्यकता नहीं पड़ी। वह तो अपनी मस्ती की बस्ती में मस्त रहता है।
शुद्ध आत्मा तत्व का परिस्पन्दन ही सही मायने में होली
मुनि श्री ने कहा कि जो अपने आत्मस्वरूप का अभ्यस्त रहता है, वह तो अपने आप में व्यस्त रहता है। फिर ना उसे दुनियादारी चाहिए, ना उसे दोस्ती-यारी चाहिए। फिर उसे क्या चाहिए तो वह कहता है मुझे तो जगत से न्यारी और सबसे प्यारी मेरी शुद्धात्मानुभूति चाहिए। उस शुद्ध आत्मा तत्व का परिस्पन्दन ही सही मायने में होली है। वह निज निरंजन निराकार ज्योति स्वरूप की भक्ति रूपी भांग की गोली हो और फिर शुद्धात्मानुभूति रूपी रंग से खेली गई होली हो। ऐसी अनोखी होली जिसमें दहन तो होलिका रूपी बुराइयों का, पापों का, अन्याय का, अनीति का, दुष्टता का, कषाय का, दुर्जनता का, अधर्म का और प्रगट हो शुद्ध आत्मा रूपी आल्हाद। वह प्रगट आल्हाद ही सही मायने में प्रहलाद है। यही दहन तो आज तक नहीं कर पाए हैं। इसलिए हम दहन होते आए हैं। कई बार देखा दहन तो हुआ पर कर्म रूपी दुष्टों का दहन आज तक नहीं कर पाए।
होलिका रूपी बुराइयों का करें दहन
जिस दिन हमने हमारे अंदर बैठी होलिका रूपी बुराइयों का दहन कर लिया अर्थात जिस दिन हमने स्वयं को पापी मानकर पश्चाताप कर लिया उस दिन आपके अंदर बैठा भगवान स्वयंमेव ही प्रकट हो जाएगा। इस संसार में चहुंओर विषय वासना की आग लगी लग रही है। उस आग के ढेर से अपने आप को वही बचा सकता है, जिसके अंतरंग में प्रभु भक्ति का, गुरु भक्ति का, शास्त्र भक्ति का रंग भरा हो। वही व्यक्ति उस आग की राख में भी अपने आप को निखार सकता है। वरना तो ऐसे आग के ढेर आपको कई बार ढेर कर चुके हैं। आप अपने आपको नष्ट कर चुके हैं। हम में और भगवान में बस इतना ही अंतर है कि भगवान उन सभी कर्मों को नष्ट कर चुके हैं जो हमारे अंदर विद्यमान हैं। हमने कितने जन्म लिए कितने जीवन लिए पर किया क्या? मात्र कर्म बंध इस अनंत संसार का अनुबंध और फिर वही संसार के संबंध।
हम संसार के कष्टों को सहते रहते हैं, पर कभी उस संसार को नष्ट करने का नहीं सोचते हैं। जिसने अपना संसार नष्ट कर लिया, उसे फिर कोई कष्ट नहीं होता है, बल्कि वह अपने आप में उत्कृष्ट होता है। आचार्य पूज्य पाद स्वामी ने योगी भक्ति में मुनिराज के लिए नरसिंह संबोधन दिया है। जिस प्रकार सभी वन्य प्राणियों का राजा सिंह होता है, उसी प्रकार सभी संसारी प्राणियों का राजा साधु होता है। वह उत्कृष्ट होता है। इसलिए उसे नरर्सिह कहा है। जिस प्रकार सिंह का जीवन निरालम्बन जीवन होता है। इसी प्रकार साधु भी सिंहवृत्ति का धारक होता है। उसकी संपूर्ण चर्या किसी भी आलंबन की मोहताज नहीं होती। कहते भी हैं साधना, साधनों की मोहताज नहीं होती। इसलिए संसार के राग रंग को छोड़कर सत्संग करो ताकि उस सत्संग रंग आपके ऊपर चढ़ जाए और ऐसा चढ़ जाए कि उस रंग में कोई भंग ना हो। दिन-ब-दिन वह रंग उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त हो और वह रंग तब तक रहे, जब तक कि आपको आपकी आत्मा का सही रंग ना दिखने लगे। जिस दिन आपको अपनी आत्मा का सही रंग दिखने लगेगा, उस दिन आपको यह दुनिया बेरंग दिखने लगेगी।













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