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मुनि श्री प्रमाणसागरजी ससंघ की सुनार नदी पुल पर की ऐतिहासिक अगवानी: मुनि संघों का मिलन देखकर भक्ति से भाव विभोर हुए श्रद्धालुगण 


सूर्याेदय के साथ ही दिसंबर की शीतलहर के साथ कोहरा छाया हुआ था और उस कोहरे में जबलपुर हाईवे पर गुरुभक्ति का जन सैलाब उमड़ पड़ा। अवसर था आचार्य श्री विद्यासागरजी शिष्य मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज, मुनि श्री संधान सागरजी महाराज ससंघ की मंगल अगवानी का। गौरझामर से पढ़िए, यह खबर…


गोरझामर। सूर्याेदय के साथ ही दिसंबर की शीतलहर के साथ कोहरा छाया हुआ था और उस कोहरे में जबलपुर हाईवे पर गुरुभक्ति का जन सैलाब उमड़ पड़ा। अवसर था आचार्य श्री विद्यासागरजी शिष्य मुनि श्री प्रमाण सागरजी महाराज, मुनि श्री संधान सागरजी महाराज ससंघ की मंगल अगवानी का। उनकी मंगल अगवानी आचार्य श्री विशुद्ध सागरजी महाराज के शिष्य मुनि श्री प्रशमसागर जी, मुनि श्री प्रणेयसागरजी, मुनि श्री योग्यसागर जी सहित सकल दि. जैन समाज गौरझामर ने की। मुनिसंघों के मंगल मिलन को देखकर अपार समूह श्रद्धा और भक्ति से भाव विभोर हो गया। मुनिसंघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि संपूर्ण गौरझामर को पचरंगी ध्वजाओं तथा तोरणद्वार से सजाया गया था। लगभग 32 वर्ष बाद मुनि श्री प्रमाणसागर जी महाराज का यहां पर आगमन हुआ है। हालांकि इसके पूर्व मुनि श्री क्षुल्लक अवस्था में यहां आ चुके थे। दोपहर में शंका समाधान का कार्यक्रम हुआ। इसके बाद मध्यान्ह में विहार हाईवे पर काछी पिपरिया की ओर हुआ।

आपके चेहरे की खुशी बता रही कि प्यास बहुत गहरी थी 

इस अवसर पर मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने कहा कि बहुत श्रम के बाद जब बहुत प्यास लगती है और बहुत गहराई से पानी को अपने हाथों से खींचकर निकाला जाता है और जब बाल्टी सामने आती है तो उसे अपूर्व आनंद की अनूभूति होती है। कुछ ऐसी ही अनुभूति आप लोगों के चेहरों को देखकर जो भावना दिख रही है। वह बता रही है कि प्यास बहुत गहरी थी। उन्होंने कहा कि गौरझामर का इस अंचल में नाम और पहचान है। हम भले ही आपके यहां 1986 तथा 1988 में जबलपुर चातुर्मास के लिए जाते समय तथा 1993 में केसली जाते समय गुरुजी के साथ आए थे। उसके बाद आज यहां आना हुआ है। हालांकि समय-समय पर गौरझामर के समाज और यहां का दिव्यघोष हमारे पास आते रहे हैं।

जीवन लता को आसमान की ऊंचाई तक पहुंचा सकते हैं

उन्होंने कहा कि आप लोगों के प्रबल पुण्य से ही यह गाड़ी जो भले ही निकल गई वह पूरी परिक्रमा लगाकर गौरझामर आ गई। उन्होंने सार संक्षेप में कहा कि मन में एक बात धारण कर के रखो कि जैसे किसी लता का विकास आलंबन के बिना नहीं होता और उस आलंबन से नन्हीं सी लता भी आसमान की ऊंचाई को छूने लगती है। वैसे ही धर्म का आलंबन पाकर हम अपनी जीवन लता को आसमान की ऊंचाई तक पहुंचा सकते हैं। मुनि श्री ने कहा कि धर्म ही हमारे जीवन की शरण है तथा धर्म में ही हमारी गति है। यह मति हमेशा बनी रहे तभी हमारे जीवन का पथ प्रशस्त होगा। उन्होंने गौरझामर की जैन समाज की तारीफ करते हुए कहा कि यहां के समाज में देव गुरु और धर्म के प्रति भक्ति कूट-कूट कर भरी है तथा आचार्य गुरुदेव की विशेष कृपा रही है।

जैनदर्शन के अनुसार सभी की शंकाओं का समाधान किया

मुनि श्री ने कहा कि यहां पर महाराज से भी मिलने का सुयोग्य बना। उन्होंने कहा कि साधु से जब साधु मिलते है तो सभी को अपार आनंद की अनुभूति होती है। उन्होंने सार संक्षेप उदबोधन के साथ दो पक्तियों के साथ कहा कि मात्र भावना कम रहे, टूटे कर्म संयोग देव शास्त्र गुरुदेव का सदा मिले शुभ योग। उन्होंने कहा कि फोर लेन पर आप लोगों को गुरुओं का सानिध्य मिलता ही रहता है। आप लोगों पर गुरुजी की विशेष कृपा रही है। यह संपूर्ण अंचल बीना वारह के भगवान शांतिनाथ का ही क्षेत्र है। आप लोगों की लगन इसी प्रकार बनी रहे। दोपहर में शंका समाधान का संचालन मुनि श्री संधान सागर जी महाराज ने किया तथा मुनि श्री ने जैनदर्शन के अनुसार सभी की शंकाओं का समाधान किया।

मंगल विहार काछी पिपरिया की ओर 

इस अवसर पर रहली, पटनागंज, जबलपुर, सागर तेंदूखेड़ा, तड़ा, केसली, दमोह, कुंडलपुर क्षेत्र से श्रद्धालु पधारे और मुनिसंघ को श्रीफल समर्पित किए। मध्यान्ह में मुनिसंघ का मंगल विहार काछी पिपरिया की ओर हुआ।

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