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प्रथम पट्टाचार्य वीर सागर जी का 68वां अंतरविलय समाधि वर्ष पूजन सहित मनाया : जीवन में हेय और उपादेय के विवेक से जीवन निर्माण होता है – आचार्य वर्धमान सागर जी


आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने टोंक नगर की धर्मसभा में हेय और उपादेय के समीचीन ज्ञान को जीवन निर्माण का आधार बताया। प्रथम पट्टाचार्य वीर सागर जी का 68वां समाधि वर्ष विशेष पूजन और गुणानुवाद के साथ मनाया गया। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…


टोंक नगर के अतिशय क्षेत्र में आयोजित धर्मसभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मंगल देशना में कहा कि जीवन का निर्माण हेय और उपादेय के विवेक से होता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हेय का अर्थ त्याग करना और उपादेय का अर्थ ग्रहण करना है। जब तक जीवन में इन दोनों का संतुलन नहीं होगा तब तक शाश्वत सुख-शांति की प्राप्ति संभव नहीं है।

आचार्य श्री ने बताया कि प्रथम पट्टाचार्य आचार्य वीर सागर जी का 68वां अंतरविलय समाधि वर्ष विशेष पूजन और गुणानुवाद सहित श्रद्धापूर्वक मनाया गया। इसी क्रम में उन्होंने प्रथमाचार्य आचार्य शांतिसागर जी के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि वे न्यायप्रिय, दया-धर्म से परिपूर्ण और तपस्वी थे। बचपन से ही उन्होंने करुणा, दान, धर्म और ध्यान को अपनाया। खेत में बैलों के स्थान पर स्वयं हल चलाना और चोरी करने वालों को भी बिना रोके जाने देना उनके जीवन की विशेषताएँ थीं।

उन्होंने कहा कि आचार्य शांतिसागर जी के उपदेशों से अन्य धर्म के लोगों ने भी प्रेरणा लेकर मांसाहार और शराब का त्याग किया। आचार्य श्री ने वर्तमान परिस्थितियों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि आज मंदिरों में पंखे और एसी के बिना पूजा संभव नहीं होती, जबकि दिगंबर साधु कठोर तप ध्यान करते हैं। हाल ही में भीषण गर्मी में मुनि श्री चिन्मय सागर जी की तप साधना इसका उदाहरण है।

धर्मसभा के दौरान समाज प्रवक्ता पवन और विकास ने बताया कि प्रतिदिन अनेक नगरों से भक्त आचार्य श्री के दर्शन करने आ रहे हैं, जिनमें जयपुर से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। आचार्य श्री के प्रवचन से पूर्व आर्यिका श्री देशना मति जी का प्रवचन हुआ। इसी अवसर पर निर्माणाधीन ध्यान मंदिर और भगवान शांतिसागर जी की प्रतिमा का भी उल्लेख किया गया। यह धर्मसभा भक्तों के लिए श्रद्धा, भक्ति और धर्ममय वातावरण से परिपूर्ण रही।

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