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जो अकड़ता है वह उखड़ता है, जो झुकता है वह टिकता है: मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने दशलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म के बारे में विस्तार से बताया 


अवधपुरी भोपाल में विराजित मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने दशलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म के बारे श्रावकों और गुरु भक्तों को मंगल वचनों से उपकृत किया। यहां पर्वाधिराज पर्युषण के अवसर पर दसलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म की उन्होंने सविस्तार व्याख्या की। अवधपुरी भोपाल से पढ़िए, अविनाश जैन की यह खबर…


 अवधपुरी भोपाल। अवधपुरी भोपाल में विराजित मुनि श्री प्रमाणसागरजी ने दशलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म के बारे श्रावकों और गुरु भक्तों को मंगल वचनों से उपकृत किया। यहां पर्वाधिराज पर्युषण के अवसर पर दसलक्षण पर्व पर उत्तम मार्दव धर्म की उन्होंने सविस्तार व्याख्या की। मुनिश्री ने कहा कि नदी में पूर आया और जब पानी उतरा तो तट पर खड़े लोगों ने देखा इस पूर में तट पर लगे बड़े-बड़े पेड़ तो उखड़ गये लेकिन, छोटी छोटी लतायें सुरक्षित थी तो एक बच्चे ने जिज्ञासा से पूछा दादाजी- बड़े-बड़े पेड़ तो उखड़ गये लेकिन, यह छोटी छोटी लतायें कैसे सुरक्षित रह गई? तो दादाजी ने जो जवाब में कहा कि जो बड़े थे। वह अकड़ में खड़े थे। वह उखड़ गये और जो छोटे थे वह पानी के बहाव के साथ झुक गये और वह सुरक्षित नजर आ रहे है। मुनि श्री ने आज के संदर्भ में चार बातें बताते हुए कहा कि झुको, मिलो,सुनो, सहो ‘जो झुकता है वह टिकता है’ झुकना सीखो नम्रता को अपने जीवन का आदर्श बनाओ।

बर्फ को एडजेस्ट करने के लिये कूटना पड़ता है

उन्होंने अहंकारी की विशेषता बताते हुये कहा कि वह टूटने को, दुःखी होने को राजी होता है लेकिन, झुकने को तैयार नहीं होता। संत कहते है कि जीवन मिला है, जीवन में सब कुछ हमारे अनुसार नहीं चलेगा। कुछ बातें हमारे मन की होती है तो कुछ बातें अपने मन की बनाना पड़ती है। जो अड़े रहते है और खड़े रहते वह उखड़ जाते है जो एडजेस्ट करके चलते हैं। वही जीवन की ऊंचाइयों को प्राप्त करते हैं। मुनि श्री ने पानी और बर्फ का उदाहरण देते हुये कहा कि पानी जिस बर्तन में डालो एडजेस्ट हो जाता है जबकि, बर्फ को एडजेस्ट करने के लिये कूटना पड़ता है। संत कहते है कि पानी बन जाओ सभी जगह स्थान बना लोगे। बर्फ जैसा जीवन बनाओगे तो कूटना पड़ेगा।

जो स्वयं झुकेगा वह दूसरों को भी झुका पाएगा 

मुनि श्री ने कहा कि जो झुकेगा वह दूसरों को भी झुका पाएगा। अहंकार में डूबा मनूष्य न तो खुद का भला कर पाता है न दूसरे का। जैसे पेड़ जितना फलदार होता है उसकी शाखाएँ उतनी झुकी होती है। मुनि श्री ने कहा कि अकड़ मुर्दे की पहचान हुआ करती है। झुकता वही है जिसमें जान है। अपने जीवन को जीवंत बनाना चाहते हो तो मार्दव धर्म को अपनाओ और झुकना सीखो। मुनि श्री ने कहा कि अपना अपना इगो छोड़ो। उन्होंने कहा कि पति-पत्नी में अनबन हो गई। गुस्से में पत्नी ने कह दिया मैं अपने मायके जा रही हूं। पति अपने काम पर निकल गया और पत्नी को समझ आई और मायके न जाकर अपने घर वापस आ गई। सांयकाल पति भी घर आ गया दोनों आमने-सामने है लेकिन, दोनों बोलने को तैयार नहीं। उनका तीन साल का बच्चा था। उसने मंदिर में गुरु के मुख से एक गीत सुना था वह उसे याद था उसके बोल थे ‘रुक मत प्राणी झुकजा, जीवन सुखी बन जाएगा’ वह बार-बार कभी मां की तरफ तो पिता की तरफ मुख करके सुनाता रहा। दोनों को हंसी आई और दोनों एक साथ बोल पड़े गलती हमारी थी और क्षमा मांगी। पति ने कहा मैं तुम्हें लेने तुम्हारे घर गया था तो मालूम पड़ा कि तुम तो वहां गई ही नहीं तो पत्नी ने कहा कि आपके जाने के बाद मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ और मैं कहीं नहीं गई। पतिदेव आप मुझे क्षमा करें। मुनि श्री ने कहा कि दोनों एक-दूसरे के सामने झुक गये तो परिवार टिक गया। यदि एक-दूसरे के सामने झुकने को तैयार नहीं होते मामला गड़बड़ा जाता। मुनि श्री ने कहा कि हर व्यक्ति में कुछ न कुछ गुण अवश्य होते हैं। उनकी अच्छाइयों को देखो। बड़प्पन तभी है जब दूसरों को मान देना शुरु करो तथा कथित ऐसे बड़े आदमी मत बनो कि तुम्हारे घर कोई गरीब आदमी न आए। उन्होंने कहा कि बड़ा आदमी वह नहीं कि उसके बड़े ठाट हों। बड़ा आदमी तो वह है जिसके पास आने वाला कोई अपने आपको छोटा महसूस न करे।

अभिनय से नही, अभिव्यक्ति से जिओ’

प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि प्रातःकाल 5. 25 से भगवान का अभिषेक एवं शांतिधारा संपन्न हुई। मुनि श्री ने भावनायोग के माध्यम से सहजता और सरल बनने का मार्ग समझाया। आगामी दिवस उत्तम आर्जव धर्म का है। जिसमें बाहरी चमक दमक छल कपट को छोड़कर सीधी सरल और निष्कपट वृति का मार्ग बताया जाएगा। ‘अभिनय से नही, अभिव्यक्ति से जिओ’। स्वार्थ पूर्ण व्यवहार से आत्म विश्वास घटता है। अविश्वास बढ़ता है संबंध खोखले होते हैं। तनाव और मानसिक विकार बढ़ते हैं इस बारे में मुनि श्री मार्गदर्शन देंगे। संस्कार शिविर में गुरुकुलम् के सभी 180 बच्चे भी अपना अध्यन के साथ संस्कार भी ग्रहण कर रहे हैं सभी बच्चों का मोबाइल का त्याग है एवं हजारों की संख्या में पधारे शिवारार्थिओं का भी प्रातः 5 से 11 बजे पूजा समाप्ति तक मोबाइल का त्याग रहता है। मुनि श्री के उदबोधन से कई लोगों ने आजीवन तो कुछ लोगों ने समय सीमा के साथ गुटका तम्बाकू एवं बाजार की वस्तुओं तथा रात्रि में चारों प्रकार के आहार का त्याग के साथ एकासन एवं निर्जला उपवास तक कर रहे हैं।

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