आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आचार्य महाराज एक बार संघ के लिए परमार्थ प्रकाश का स्वाध्याय करा रहे थे। सन 84 की बात हो सकती है। जबलपुर में उसका परमार्थ प्रकाश का स्वाध्याय। ग्रीष्माकाश में प्रातः और मध्यान में धवला का वाचन चलता था और धवला के वाचन के पश्चात परमार्थ प्रकाश का संघ के लिए स्वाध्याय कराया। हमें लगता है थोड़ा सा भी हम कार्य करते हैं तो उसमें प्रतिकूलता का अनुभव करते हैं। जबकि उन्होंने कितना श्रम किया है अकेला होकर के इतना विशाल संघ का निर्माण किया है। पढ़िए राजीव सिंघई मोनू की रिपोर्ट…
कुंडलपुर (दमोह)। सुप्रसिद्ध सिद्ध क्षेत्र कुंडलपुर में युग श्रेष्ठ संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के परम प्रभावक शिष्य विद्या शिरोमणि परम पूज्य आचार्य श्री समय सागर जी महाराज ने मंगल प्रवचन देते हुए कहा कि आचार्य महाराज एक बार संघ के लिए परमार्थ प्रकाश का स्वाध्याय करा रहे थे। सन 84 की बात हो सकती है। जबलपुर में उसका परमार्थ प्रकाश का स्वाध्याय। ग्रीष्माकाश में प्रातः और मध्यान में धवला का वाचन चलता था और धवला के वाचन के पश्चात परमार्थ प्रकाश का संघ के लिए स्वाध्याय कराया। हमें लगता है थोड़ा सा भी हम कार्य करते हैं तो उसमें प्रतिकूलता का अनुभव करते हैं। जबकि उन्होंने कितना श्रम किया है अकेला होकर के इतना विशाल संघ का निर्माण किया है और स्वयं अपना भी कल्याण करके वह निकल गए हैं। प्रतिकूलताएं अनुकूलताएं है यह तो लगी हुई हैं अंतर अंतर बोध में कर्मों का उतार चढ़ाव देखने में आता है।
क्योंकि पूर्व में बंधा हुआ जो कर्म है वह अपने आप क्षय को प्राप्त नहीं होता अपने आप निर्जरा नहीं होती। किंतु निर्जरा करने के लिए कुछ साधन है जिन साधनों के माध्यम से निर्जरा होती है। जैसे तपशा निर्जरा च ऐसा कहा तप के माध्यम से निर्जरा होती है। परीषहों के ऊपर विजय प्राप्त करने से भी निर्जरा होती है।संवर भी होता है यह सारा का सारा विषय आगम के माध्यम से आस्था का विषय बन जाता है। जिसके अंदर आस्था है श्रद्धा है रुचि है तो उसके माध्यम से वह चारित्र के क्षेत्र में कदम बढ़ाता है। तो मुझे विस्मय होता है ग्रीष्म ऋतु में इतनी भयानक गर्मी पड़ रही है मडिया जी में पहाड़ चट्टान तपती है दिन भर रात में वह चट्टान ठंडी नहीं हो पाती और पुनः सूर्योदय हुआ तो वह चट्टान तपती रहती है लू चलती रहती है ।12 घंटा नहीं रात में भी लूं चलती रहती है इसके बावजूद भी दो-तीन बार वाचना वह एक दिन में करते थे।
उन्होंने क्या नहीं दिया सब कुछ दे दिया प्रकाश पूरा का पूरा उन्होंने सर्वत्र फैला दिया और उसके उपरांत भी हमें कठिनाई का अनुभव होता है तो थोड़ा कष्ट तो होगा और परमार्थ प्रकाश पढ़ाते समय एक प्रसंग आया था ।योगेंद्र देव ने उसकी रचना की है परमार्थ प्रकाश की ।उसमें प्रसंग आया है केवल ज्ञान की विराटता को लेकर के जिस प्रकार आसमान में आसमान के किसी एक कोने में तारा दिखाई देती है आकाश में आकाश कितने प्रदेशीय है आकाश के अनंत प्रदेश होते हैं उस अनंत प्रदेशात्मक उस आकाश द्रव्य में एक कोने में तारा दिखाई दे रही है किंतु सर्वत्र ताराये नहीं होती हैं अनंत प्रदेश के बीच में जो लोकाकाश है 343 राजू गुण राजू प्रमाण विस्तार लोकाकाश है वह कैसा देखने में आता है जैसे आसमान के किसी कोने में तारा देखने मिल जाती तो आकाश बहुत लंबा चौड़ा है ओर छोर है नहीं अनंत प्रदेशात्मक है उसके बीच में यह तीन लोक खड़ा है तारे की भांति और आकाश जो अनंत प्रदेशीय है वह एक ही द्रव्य है ।
आकाश द्रव्य अनेक नहीं है आकाश तक एक-एक द्रव्य हुआ करते हैं। धर्म द्रव्य और अधर्म द्रव्य एक आकाश अनंत प्रदेशीय जो आकाश है इस प्रकार के अनंत भी आकाश आ जाएं ,हैं नहीं परिकल्पना हम कर लें तब भी केवल ज्ञान रूपी आकाश में सारे के सारे समाहित हो जाते हैं। इतना विशाल रूप है केवल ज्ञान का अर्थ ये है केवल ज्ञान में ऐसा कोई भी ज्ञेय पदार्थ अवशिष्ट नहीं है जो ज्ञान का विषय नहीं बना हो। दूसरी बात ध्यान देने की बात यह है केवल ज्ञान उत्पन्न होने के प्रथम समय में सारा विश्व उनके केवल ज्ञान में आया है ।अब अनंतर समय के ज्ञान के विषय के लिए कोई नया ज्ञेय नहीं आएगा।













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