भगवान सुपार्श्वनाथ जी जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर हैं। उनका ज्ञान कल्याणक 7 फरवरी को और तिथि के अनुसार फाल्गुन माह की षष्ठी के दिन मनाया जाएगा। दिगंबर जैन मंदिरों में इस दिन विशेष धार्मिक अनुष्ठान, भगवान के अभिषेक, शांतिधारा सहित अन्य धार्मिक विधियों से तीर्थंकर भगवान का पूजन आदि किया जाएगा। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष शृंखला में आज पढ़िए, उपसंपादक प्रीतम लखवाल की यह संकलित और संपादित प्रस्तुति…
इंदौर। भगवान सुपार्श्वनाथ जी जैन धर्म के सातवें तीर्थंकर हैं। उनका ज्ञान कल्याणक 7 फरवरी को और तिथि के अनुसार फाल्गुन माह की षष्ठी के दिन मनाया जाएगा। दिगंबर जैन मंदिरों में इस दिन विशेष धार्मिक अनुष्ठान, भगवान के अभिषेक, शांतिधारा सहित अन्य धार्मिक विधियों से तीर्थंकर भगवान का पूजन आदि किया जाएगा। जैन धर्म के 7वें तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ जी का ज्ञान कल्याणक (केवल ज्ञान प्राप्ति) फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी (6ठी) को वाराणसी के सहतुक वन में हुआ था। उन्होंने दीक्षा के बाद 9 महीने तक कठोर तप किया। इसके बाद उन्हें सिरीष वृक्ष के नीचे कैवल्य ज्ञान प्राप्त हुआ। भगवान सुपार्श्वनाथ जी ने केवलज्ञान के बाद उन्होंने धर्म का उपदेश दिया और 4 तीर्थों (संघ) की स्थापना की। उनके 95 प्रमुख गणधर थे। ज्ञान कल्याणक का यह दिवस भगवान सुपार्श्वनाथ जी के आत्मज्ञान और सर्वज्ञता की प्राप्ति का प्रतीक है। इस दिन को जैन धर्मावलंबी और दिगंबर जैन समाज के लोग बड़ी ही श्रद्धा और उल्लासपूर्ण भक्ति के साथ मनाते हैं। जैन ग्रंथों में उल्लेखित जानकारी के अनुसार सुपार्श्वनाथ जी वर्तमान अवसर्पिणी काल के सातवें तीर्थंकर थे। इनका जन्म वाराणसी के इक्ष्वाकुवंशी क्षत्रिय परिवार में हुआ था। वाराणसी में गंगा किनारे स्थित जैन घाट पर भगवान सुपार्श्वनाथ को समर्पित एक मंदिर है। यह भगवान की जन्म स्थली के रूप में विख्यात है। यहीं पर स्याद्वाद महाविद्यालय भी स्थित है।
सुपार्श्वनाथ भगवान का अन्यत्व भावना पर सुंदर उपदेश
छठे स्वर्ग से राजा नंदीसेन की आत्मा ने भारत क्षेत्र के वाराणसी नगरी में राजा प्रतिष्ठा और रानी पृथ्वी के स्थान पर तीर्थंकर के रूप में जन्म लिया। जब भगवान का जन्म हुआ तब समस्त संसार में शांति छा गई। यहां तक कि नरक में भी शांति छा गई। श्री सुपार्श्वनाथ भगवान ने अन्यत्व भावना पर एक बहुत ही सुंदर उपदेश दिया है। हम उन चीजों में लीन हो जाते हैं जिनसे हम आसक्त और मोहित होते हैं। हम मानते हैं कि वास्तविक सुख केवल उन्हीं में निहित है और हम उन्हें ही सब कुछ समझते हैं। हम अपने शरीर, सौंदर्य, सांसारिक सुख, आराम और विलासिता में ही लगे रहते हैं। परिणाम स्वरूप, हम अपनी आत्मा की संपूर्ण महिमा खो देते हैं।
तीर्थंकरों का उपदेश हृदय की गहराई को छूता है
संसार के बाहरी धन-दौलत में लीन रहने से हम आत्मा के आंतरिक आनंद, मोक्ष-वैभव, मोक्ष-लक्ष्मी से वंचित रह जाते हैं। जब तीर्थंकरों या ज्ञानियों का ऐसा उपदेश हमारे हृदय को गहराई से छूता है तो वह हमारे कर्मों के सभी पर्दों को भेद देता है और तब हम अपने मोक्ष-वैभव, अपने आत्म-वैभव (आत्मा के आनंद) का अनुभव करते हैं। उस आनंद का अनुभव करने के बाद, सांसारिक सुख फीके लगने लगते हैं। ठीक वैसे ही जैसे जलेबी खाने के बाद चाय का स्वाद बेस्वाद लगता है। श्री सुपार्श्वनाथ भगवान के 95 गणधर (तीर्थंकर के प्रमुख शिष्य) थे। उनके संघ में लाखों साधु और साध्वियाँ थीं। इस संसार के उद्धार के लिए भगवान ने एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा की। उन्होंने समेत शिखरजी पर्वत से निर्वाण प्राप्त किया। भगवान सुपार्श्वनाथ की जीवन गाथा हमें मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ने और अपने मन, शरीर और वाणी का उपयोग दूसरों के कल्याण के लिए करने का एक बहुत ही उच्च संदेश देती है।













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