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12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी का ज्ञान कल्याणकः धर्म की विवेचना कर भगवान वासुपूज्य ने जैन धर्म को आगे बढ़ाया


जैन धर्म के 12वें तीर्थंकर वासुपूज्य जी स्वामी का 31 जनवरी को ज्ञान कल्याणक है। इनकी गणधर संख्या 66 बताई गई है। इनके बारे में विशेषता यह है कि तीर्थंकर भगवान के पांचों कल्याणक चंपापुर में ही हुए हैं। भगवान वासुपूज्य स्वामी फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन 676 राजाओं के साथ स्वयं दीक्षित हुए। योग निरोध कर रजतमालिका नामक नदी के किनारे वर्तमान चंपापुरी नगरी में स्थित मंदारगिरि के शिखर के मनोहर उद्यान में पर्यंकासन से स्थित होकर भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशी के दिन 94 मुनियों के साथ मुक्ति को प्राप्त हुए। श्रीफल जैन न्यूज की विशेष श्रृंखला में आज पढ़िए यह खास रिपोर्ट…


इंदौर। पुष्करार्ध द्वीप के पूर्व मेरू की ओर सीता नदी के दक्षिण तट पर वत्सकावती नाम का देश है। उसके अतिशय प्रसिद्ध रत्नपुर नगर में पद्मोत्तर नाम का राजा राज्य करता था। किसी दिन मनोहर नाम के पर्वत पर युगंधर जिनेंद्र विराजमान थे। पद्मोत्तर राजा वहां जाकर भक्ति, स्तोत्र, पूजा आदि करके अनुप्रेक्षाओं का चिंतवन करते हुए दीक्षित हो गया। 11 अंगों का अध्ययन करके दर्शनविशुद्धि आदि भावनाओं की संपत्ति से तीर्थंकर नामकर्म का बंध कर लिया। जिससे महाशुक्र विमान में महाशुक्र नामका इंद्र हुआ।

भगवान वासुपूज्य जी का गर्भ और जन्म

इस जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र में चंपानगर में ‘अंग’ नाम का देश है। जिसका राजा वसुपूज्य था और रानी जयावती थी। आषाढ़ कृष्ण षष्ठी के दिन रानी ने पूर्वाेक्त इंद्र को गर्भ में धारण किया और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन पुण्यशाली पुत्र को उत्पन्न किया। इंद्र ने जन्म उत्सव करके पुत्र का ‘वासुपूज्य’ नाम रखा। जब कुमार काल के 18 लाख वर्ष बीत गए। तब संसार से विरक्त होकर भगवान जगत के यथार्थ स्वरूप का विचार करने लगे। तत्क्षण ही देवों के आगमन हो जाने पर देवों द्वारा निर्मित पालकी पर सवार होकर मनोहर नामक उद्यान में गए और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन 676 राजाओं के साथ स्वयं दीक्षित हो गए।

भगवान वासुपूज्य जी को केवलज्ञान और उनका मोक्ष

छद्मस्थ अवस्था का एक वर्ष बीत जाने पर भगवान ने कदंब वृक्ष के नीचे बैठकर माघ शुक्ल द्वितीया के दिन सायंकाल में केवलज्ञान को प्राप्त कर लिया। भगवान बहुत समय तक आर्यखंड में विहार कर चंपानगरी में आकर एक वर्ष तक रहे। जब आयु में एक माह शेष रह गया। तब योग निरोध कर रजतमालिका नामक नदी के किनारे की भूमि पर वर्तमान चंपापुरी नगरी में स्थित मंदारगिरि के शिखर को सुशोभित करने वाले मनोहर उद्यान में पर्यंकासन से स्थित होकर भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशी के दिन 94 मुनियों के साथ मुक्ति को प्राप्त हुए।

…तो मनुष्य को धर्म की प्राप्ति के लिए उत्सुक होना चाहिए

केवलज्ञान प्राप्त करने के पश्चात भगवान वासुपूज्य ने देशना देना आरंभ किया। जिसे सुनकर अनेकों के जीवन में परिवर्तन आया। एक बार उन्होंने धर्म पर सुंदर देशना दी। जब मनुष्य ने उच्च संस्कारवान कुल में जन्म लिया हो, जहां अच्छे माता-पिता हों तथा अच्छे नैतिक मूल्य दिए हों तो मनुष्य को धर्म की प्राप्ति के लिए उत्सुक होना चाहिए। आम धारणा यह है कि धर्म का मतलब पूजा-पाठ, आरती, माला जपना और भगवान का नाम जपना आदि है। ये कर्मकांड आमतौर पर एक घंटे या उससे भी कम समय के लिए किए जाते हैं लेकिन, फिर, बाकी 23 घंटों का क्या? बाकी दिनों में किस तरह के कर्मों का बंधन है। इसका कोई अहसास नहीं होता। खासतौर पर मनुष्य के रूप में धर्म का बहुत महत्व है। जो कोई भी धर्म का पालन करता है उसे हर समय आंतरिक शांति में रहना चाहिए। बाहरी तौर पर शांति की स्थिति हो सकती है या नहीं भी हो सकती है लेकिन आंतरिक शांति सच्चे धर्म का स्वाभाविक परिणाम है।

जो परिणाम लाता है वही धर्म है

धर्म की परिभाषा क्या है? जो परिणाम लाता है, वही धर्म है। तो अगर वह परिणाम नहीं देता, तो उसे धर्म कैसे कहा जा सकता है? हम चाहे जितना भी धर्म का पालन करें, अगर अंदर शांति नहीं रहती और चिंताएं, समस्याएं, संघर्ष और वासनाएं हमारे ऊपर हावी रहती हैं, तो इन सबका परिणाम क्या है? अगर परिणाम यह नहीं है कि अंदर शांति बनी रहती है तो उसे धर्म का पालन नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार, हम कहीं न कहीं गलत कर रहे हैं। उस गलती को ढूंढ़ना और उससे बाहर आना ज़रूरी है। संक्षेप में अगर हम धर्म का पालन कर रहे हैं तो परिणाम आना चाहिए।

प्रत्येक तत्व अपने आंतरिक कार्यात्मक गुणों के साथ होता है

धर्म की एक और सुंदर लेकिन मौलिक परिभाषा है। जब कोई पदार्थ अपने आंतरिक कार्यात्मक गुणों ( गुण धर्म ) में प्रबल होता है,तो वह धर्म है। प्रत्येक पदार्थ अपने स्वयं के आंतरिक कार्यात्मक गुणों के साथ होता है। तीर्थंकरों के आध्यात्मिक विज्ञान के अनुसार ब्रह्मांड में छह शाश्वत तत्व हैं। इनमें से प्रत्येक तत्व अपने स्वयं के आंतरिक कार्यात्मक गुणों के साथ होता है। हालांकि, जब तक कोई पदार्थ अपने आंतरिक कार्यात्मक गुणों में प्रबल नहीं होता, तब तक उसे पदार्थ नहीं कहा जाता।

सोना तभी सोना कहलाता है जब उसमें निहित गुण हों

उदाहरण के लिए सोना तभी सोना कहलाता है जब उसमें निहित गुण हों यानी वह पीला हो, चमकीला हो, ढाला जा सके। उसमें जंग न लगे और वह काला न हो। इसी तरह गुलाब का एक निहित गुण उसकी खुशबू है। जो गुलाब जैसा दिखता है, लेकिन उसमें खुशबू नहीं होती, वह गुलाब का निहित गुण नहीं है। यानी वह असली गुलाब नहीं है, वह नकली है। अगर लकड़ी का आम, चाहे वह कितना भी सुंदर क्यों न हो, उसमें कोई खुशबू, कोमलता या स्वाद नहीं है, तो उसे आम कैसे कहा जा सकता है? जब वह अपने निहित गुणों के साथ हो, तभी उसे आम कहा जाता है।

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