टोंक नगर में आयोजित धर्मसभा में आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने मंगल देशना देते हुए कहा कि ज्ञान आत्मा का दर्पण है जिसके द्वारा अपनी कमियों को सुधारा जा सकता है। इसी अवसर पर आचार्य श्री ने केशलोचन भी किया। पढ़िए राजेश पंचोलिया, इंदौर की ख़ास रिपोर्ट…
टोंक नगर की धर्मसभा में वात्सल्य वारिधि पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज ने मंगल देशना में कहा कि जैसे व्यक्ति दर्पण में अपना चेहरा देखकर कमियां सुधारता है, वैसे ही आत्मा के दर्पण रूपी ज्ञान से अपनी आत्मिक कमियों को दूर किया जा सकता है। सोलह कारण भावना का पर्व चल रहा है, जिसमें त्याग और संयम के बिना मुक्ति की प्राप्ति संभव नहीं है। तपस्या से अनेक रिद्धि और सिद्धि प्राप्त होती हैं, परंतु तप शक्ति को छुपाए बिना करना चाहिए।
आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि शुभचंद्र आचार्य ने तप के बल पर धूल को स्वर्ण बना दिया और सिद्ध क्षेत्र सोनागिर इसी कारण से प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने आगे कहा कि प्रत्येक जीव के शरीर में आत्मा रूपी देव विराजमान है और जैसे-जैसे विकार दूर होते हैं, वैसे-वैसे आत्मा की शक्ति बढ़ती है। प्रथमाचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज ने भी यश और नाम-कीर्ति से दूर रहकर अक्षय कीर्ति शक्ति प्राप्त की।
केशलोचन साधु का मूल गुण
इसी अवसर पर आचार्य श्री वर्धमान सागर जी ने अपना केशलोचन किया। इस पर मुनि श्री हितेंद्र सागर जी ने बताया कि प्रत्येक दिगंबर साधु को 2 से 4 माह में केशलोचन करना अनिवार्य है। यह साधु का मूल गुण है, जिससे राग और मोह का त्याग होता है। उन्होंने कहा कि केशलोचन करते समय केवल राख का उपयोग किया जाता है, ताकि अहिंसा धर्म की रक्षा हो सके।
वैराग्यपूर्ण भजनों के माध्यम से अनुमोदना की
जैन साधु अपने हाथों से बाल उखाड़ते हैं क्योंकि वे अपरिग्रही होते हैं। बाल सौंदर्य और आकर्षण का प्रतीक हैं, जिन्हें त्याग कर साधु ममत्व और मोह से मुक्त होते हैं। जिस दिन साधु केशलोचन करते हैं, उस दिन वे उपवास भी करते हैं। इस अवसर पर अनेक साधुओं और महिलाओं ने वैराग्यपूर्ण भजनों के माध्यम से अनुमोदना की और केशलोचन की तपस्या में श्रद्धा प्रकट की।













Add Comment