कोई भी क्रिया अच्छी बुरी नहीं होती, ये सृष्टि सापेक्षवाद के सिद्धान्त पर व्यवस्थित चल रही है तो सापेक्षवाद का सिद्धान्त है- ‘न यह सत्य है, न वह सत्य है, यह भी सत्य है और वह भी सत्य है। सापेक्षवाद का सिद्धांत अभावरूप भी है और सद्भावरूप भी है। इस दुनिया मे कुछ भी नहीं है ये अभावरूप हुआ, इस दुनिया में सबकुछ है यह सद्भाव रूप हुआ। यह विचार मुनि श्री सुधासागर ने व्यक्त किए। पढ़िए राजीव सिंघई की विशेष रिपोर्ट…
सागर। कोई भी क्रिया अच्छी बुरी नहीं होती, ये सृष्टि सापेक्षवाद के सिद्धान्त पर व्यवस्थित चल रही है तो सापेक्षवाद का सिद्धान्त है- ‘न यह सत्य है, न वह सत्य है, यह भी सत्य है और वह भी सत्य है। सापेक्षवाद का सिद्धांत अभावरूप भी है और सद्भावरूप भी है। इस दुनिया मे कुछ भी नहीं है ये अभावरूप हुआ, इस दुनिया में सबकुछ है यह सद्भाव रूप हुआ। क्रिया बंध का कारण नही है, अभिप्राय बंध का कारण होता है।
ये दुनिया विनाशशील नही है, हम विनाश को देखते है इसलिए विनाश दिखता है, हम विनाश को देखना बंद कर दे कोई भी चीज मिटती हुई नजर नहीं आएगी। हमारी दृष्टि में सृष्टि का स्वरूप क्या है? यह विचार मुनि श्री सुधासागर ने व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि पहले नम्बर का व्यक्ति वह है जो सबसे ज्यादा निकृष्ट है, सदा अभाव की अनुभूति करता है। अभाव में सद्भाव की अनुभूति दूसरे नम्बर का व्यक्ति करता है जो उसके पास है उसकी अनुभूति करता है। तीसरे नम्बर पर जो सर्वश्रेष्ठ है वह है सद्भाव में अभाव की अनुभूति करना।
वस्तु है, शरीर है लेकिन उसे शरीर का अनुभव नही हो रहा है, मर रहा है लेकिन मौत का अनुभव नही हो रहा है। देख रहा है लेकिन देखने की अनुभूति नही होती, इसी का नाम है त्याग, तपस्या। सबकुछ सामने मौजूद है लेकिन सद्भाव को वह अभाव में बदल देता है। मिलने पर यदि त्याग किया जाए तो वह त्याग है, नही मिलने पर त्याग किया तो उस त्याग का कोई मतलब नही है।
धर्म से वंचित न रह
हम साधुओं के लिये सारी वस्तुयें उपकारी है तो भी त्यागना है क्योंकि वह पर है। आप लोगों की पहचान होना चाहिए कि आपको धन दौलत सबकुछ मिला रहा था लेकिन वह तुम्हें धर्म से वंचित कर देगा, गुरु को आहार देने से वंचित हो जाओगे, भगवान के अभिषेक से वंचित हो जाओगे। यदि ऐसा भाव तुम्हारे मन में आ जाये कि जिन जिन कार्यों से हम धर्म से, धर्मात्मा से वंचित हो जायेंगे, वे वे कार्य मैं कर सकता हूं, करने में समर्थ हूँ लेकिन मैं नही करूंगा, मैं ऐसे कार्यों का त्याग करता हूं। यदि कभी तुम्हे मौत का समय पता चल जाये, बस आपको स्वयं को संसार का सबसे बड़भागी मानना है, मैं वह व्यक्ति हूँ जिसे मौत का पता चल गया कि मैं मरने वाला हूँ। बहुत बड़ी गॉड गिफ्ट है कि तुम्हे मरने का समय पता चल गया, चाहे भले वह फांसी भी क्यों न हो। अधिक समय तो मैं परिणाम नही सम्भाल सकता था लेकिन 5 मिनिट को तो मैं परिणाम संभाल सकता हूँ, फांसी पर चढ़ रहा है, अंजन चोर जैसा पापी है, बहुत पाप करके आया है और उस समय चिन्तन चल रहा है आत्मा स्वभाव परभाव भिन्नं, मैं अजर अमर अविनाशी शाश्वत चैतन्य आत्मा हूँ। फांसी के फंदे से भी वह सीधे 16वे स्वर्ग चला गया, व्रत ले लिया मैं सब परिग्रह का त्याग करता हूँ।
संकल्प करें
आज से बस एक ही प्रार्थना करो भगवान से कि भगवन मुझे कुछ नहीं चाहिए, सब मेरे पास है, जब मैं मरूं तो मरने के पहले मुझे अपना पता चल जाये कि मैं आज मरने वाला हूं, उतने मैं ही तुम ज्ञानी व्यक्ति कहलाओगे। जब अपने पास संकल्प शक्ति हो तो अपन सारी सृष्टि को अपनी मुट्ठी में बांध सकते हैं। सारी दुनिया अपने अनुसार चलने को तैयार हो जाएगी, बस संकल्प हमें चाहिए।
गुरु की आज्ञा
गुरु से भी बड़ी है गुरु की आज्ञा और भगवान से भी बड़ी है भगवान की आज्ञा। मुनि महाराज को भगवान ने जो आज्ञा दी है उसमे यदि एक को छोड़ना पड़ेगा, या तो भगवान छोड़ना पड़ेगा या भगवान की आज्ञा छोड़नी पड़ेगी तो हमारा कल्याण भगवान से नही, भगवान की आज्ञा, उपदेश मनाने से होगा। गुरु से बड़ी सम्पत्ति है गुरु की आज्ञा। गुरु के दर्शन करने का मन है, उपवास करने का मन है और गुरु मना कर रहा है तो नीति कहती है तुम्हारी भावना से कहीं गुना बड़ी गुरु की आज्ञा है। गुरु के मना करने पर उपवास का कोई ज्यादा फल नही मिलने वाला और एक व्यक्ति ने गुरु के मना करने पर आहार किया, हजारों, लाखों उपवासों से बहुत बड़ा पुण्य कर लिया क्योंकि वह आहार को भी गया तो गुरु की आज्ञा से गया।
कठिनाइयों का अर्थ
हर गरीब को हर परेशान व्यक्ति को सोचना है कि यह मुझे अभिशाप नहीं है यह हमारी उद्दंडता के लिए सच्चे धर्म रूपी पिता का अंकुश है क्योंकि हम पापों को छोड़ नहीं पाए तो सच्ची जिनवाणी मां कहती है ये पाप नहीं छोड़ पा रहा है तो पाप तो मैं इसे करने नही दूंगी तो उसका तरीका उसने गरीबी अपनाया, परेशानी अपनाया। ये गॉड गिफ्ट है तुम्हें गरीबी नहीं दी है, तुम्हें पाप से बचाया गया है।













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