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पंचम पट्टाधीश आचार्य श्री के भाद्रपद शुक्ला सप्तमी अवतरण 75वें वर्ष वर्धन हीरक जन्म जयंती पर सादर गुणानुवाद भावांजलि : गुरु चलते फिरते तीर्थ…. गुरु ही गोविंद, डॉक्टर, वकील, इंजीनियर हैं 


जन्म जयंती के अवसर पर पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधि 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का गुणानुवाद का प्रयास छोटी शिष्या कर रही हैं। कहते हैं कि जंगल की समस्त लकड़ी की टहनी को कलम ,संपूर्ण धरती को कागज और बादल की बूंदों को स्याही बना कर भी गुरु की महिमा का बखान गुणानुवाद करने में सक्षम नहीं हैं। पढ़िए आर्यिका श्री महायश मति संघस्थ आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का विशेष आलेख (संकलन – राजेश पंचोलिया)


गुरु गोविंद दोनों खड़े , काके किनके लागु पाय, बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताय अर्थात गुरु ही हमे गोविंद भगवान का ज्ञान स्वरूप दिखाते हैं। इस कारण पहले गुरु को नमस्कार किया गया। यहां गुरु से आशय जैन धर्म के आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्टि से हैं। हम इन परमेष्टि का गुणानुवाद कर रहे हैं।

पंचम पट्टाघीश आचार्य श्री वर्धमान सागर जी महाराज वर्ष 2024 का वर्षायोग पारसोला जिला प्रतापगढ़ में कर रहे हैं।

जन्म जयंती के अवसर पर पंचम पट्टाधीश वात्सल्य वारिधी 108 आचार्य श्री वर्धमान सागर जी का गुणानुवाद का प्रयास छोटी शिष्या कर रही हैं। कहते हैं कि जंगल की समस्त लकड़ी की टहनी को कलम ,संपूर्ण धरती को कागज और बादल की बूंदों को स्याही बना कर भी गुरु की महिमा का बखान गुणानुवाद करने में सक्षम नहीं हैं।16 कारण भावना में 11 वी भावना आचार्य भक्ति की है, अरिहंत भक्ति ,आचार्य भक्ति , बहुश्रुतभक्ति और प्रवचन भक्ति के माध्यम से देव शास्त्र गुरु की आराधना गुणानूवाद करते हैं ।सभी के साथ भक्ति शब्द जुड़ा है भक्ति का मतलब होता है गुणों के प्रति अनुराग होना ,चाहे भगवान हो ,आचार्य परमेष्ठी हो या उपाध्याय परमेष्ठी हो साधु परमेष्टि हो उनके विशेष गुणों की चर्चा शास्त्रों में बताई गई है कि आचार्य की क्या गुण होते हैं जिस प्रकार अरिहंत भगवान के 46 गुण होते हैं उसी प्रकार आचार्य परमेष्ठी के 36 मूल गुण बताए गए हैं। गुरु हमे ज्ञान रूपी प्रकाश देकर हमारा अज्ञान रूपी अंधकार दूर करते हैं । गुरु के बिना ज्ञान, मोक्ष की राह, सत्य , नही मिलता गुरु हमारे दोष दूर करते हैं। गुरु निस्वार्थ बिना भेदभाव के जीवन की सद राह दिखाते हैं। गुरु जीवन जीने की कला दिखाते हैं गुरु के उपकार का कोई मोल नहीं है। गुरु चलते फिरते तीर्थ होते हैं। आचार्य साधु की समाधि के समय नियार्पकाचार्य बनते हैं उनका कर्तव्य होता है कि वह क्षपक साधु के परिणाम स्थिर रखें उसमें आकुलता नहीं आए और आकुलता आने पर आचार्य उन्हें हित मित प्रिय वचन के माध्यम से संबोधन कर ममता प्रदान करते हैं जिस प्रकार एक बालक को माता दुलार करती है उसी प्रकार आचार्य परमेष्ठी भी अपने शिष्यों को वात्सल्य और ममता देते हैं । साधु के जीवन में समाधि सल्लेखना संयम जीवन का शिखर कलश है । जिस प्रकार नाव से नदी नाविक पार कराता है, उसी प्रकार आचार्य परमेष्ठी क्षपक साधु सहित सभी को संसार सागर से धर्म रूपी नाव के माध्यम से पार कराते हैं ।

आचार्य अपने शिष्यों का लालन पालन बच्चों की भांति अपने मधुर वचनों से करते हैं साधुओं को उनके कर्त्तव्य के प्रति सचेत करते हैं आचार्य परमेष्ठि भाषा समिति अनुसार प्रेम से संबोधन करते हैं ।आचार्य श्री ने बताया भगवान की भक्ति से जीवन को सफल सार्थक बनाने का पुरुषार्थ करना चाहिए।आचार्य श्री शांतिसागर जी महाराज द्वारा आरोपित चरित्र रूपी पौधे की वृद्धि एवं रक्षा पूर्वाचार्यो द्वारा अभिसिंचित उस चारित्र वृक्ष ने वर्तमान में विशाल रूप धारण किया ।है उसका संरक्षण ,सिंचन एवं संवर्धन आचार्य श्री वर्धमान सागर जी बहुत ही कुशलता से कर रहे हैं।आपकी शासन पद्धति अपने आप में बहुत ही महान है आप के शासन में इस निकृष्ट पंचम काल में भी पूर्वाचार्यो की परंपरा का निर्वाह विशाल संघ एक सूत्र में अनुबद्ध है आपके हृदय में स्तिथ मृदुता की प्रतीक सरल स्पष्ट एवम मृदु वाणी हास्य युक्त प्रसन्न मुख मुद्रा से प्रभावित होकर अनेक भव्य आत्मा अपने पापों का पक्षालन करते हुए जीवन सफल एवं धन्य मनाते हैं।

आपका व्यक्तित्व अनेक विशेषताओं को दिया हुआ है।आपकी निर्भय एवं निरीह वर्ति समन्वित समदृष्टि इस आशय का द्योतक है कि निर्धन और श्रीमंत आदि सभी के प्रति आपका समान व्यवहार है । इस प्रकार आपके ज्योतिर्मय जीवन की जगमगाती ज्योति से आज कितने ही प्राणी अपने आत्म ज्योति का अन्वेषण कर रहे हैं और करते रहेंगे ।आपकी अथाह महिमा को प्रदर्शित करना अशक्य हैं ,मैं छोटी सी शिष्या आचार्य श्री के चरणों में त्रिकाल नमोस्तु करती हूं तथा कुछ मन के भावों के श्रद्धा सुमन को अर्पित करती हुई भावना करती हू कि गुरुदेव शतायु होकर हमें मार्गदर्शन देते रहें ।आपके द्वारा प्रदत आर्यिका व्रत आपकी पुनीत छत्र छाया में निर्दोष पलता रहे। आप के संपर्क में जो व्यक्ति एक बार आ गया वह आपकी सौम्य प्रशांत मूर्ति को विस्मृत नही कर सकता है आपका व्यवहार पक्ष जितना सुंदर और सबल है उतना ही आध्यात्मिक पक्ष प्रबल है समता आपके व्यवहार में सह चारणी के रूप में रहती है सच तो यह है कि आप की मधुर वाणी सौम्य छबि वात्सल्यता के कारण जन-जन के हृदय में अपना स्थान बना लिया आपके निर्मल मन की आभा ने लोगों की अपनी ओर खींच लिया है और आपकी सरलता और भद्रता ने देश व समाज पर मानो जादू कर दिया है आपके जीवन का प्रत्येक क्षण उच्च साधना का परिचय देता है क्योकि मिथ्यान्धकार से ग्रसित जीवो को आप अपने आलोक से प्रकाश प्रदान करने में सूर्य व्रत सिद्ध हुए हैं ।

पूज्य गुरुदेव लोकानुरंजन से दूर रहते हैं रत्नत्रय की निधि में आप सदा आलोकित रहते हैं आप की आगम निष्ठा एवम तपश्चरण अग्नि सराहनीय है तभी तो आज दिगंबर साधु समुदाय में आपका जीवन अत्यंत गौरवपूर्ण श्रद्धा के आधार का केंद्र बना हुआ है वर्तमान की भौतिकता के युग में भी आप पूर्वाचार्य की चतुर्थ कालीन चर्या का निर्वहन स्वयं भी कर रहे हैं और शिष्य साधुओं से भी कर रहे हैं।

विशेषताएं

आचार्य श्री वर्धमान सागर जी भगवान हैं,माता पिता है,शिक्षक है,एक डाक्टर के रूप में रत्नत्रय रूपी औषधि से जन्म मरण का रोग दूर करते हैं,एक इंजीनियर की भांति सुद्र्द धर्म ज्ञान चारित्र रूपी नीव से जीवन का निर्माण करते हैं एक वकील की भांति अच्छे बुरे का ज्ञान करा कर सही हितकारी सलाह देते है।वीतराग वाणी को जीवन में आकार रूप देने वाले आर्त और रौद्र ध्यान से दूर रहने वाले स्व पर कल्याण में दत्तचित की तरह रहने वाले साधना में सर्वोच्च स्थान रखने वाले प्रेरणास्पद व्यक्तित्व के धनी दिव्य ज्योति करुणा के सागर प्रवचन पटू शांत स्वभावी भद्र परिणामी ज्ञान ध्यान तप में सदा निरत निस्पर्ह सहिष्णुता की साकार मुर्ति अदिवतीय संत बस यही है आपका जीवन परिचय जो स्वयम मोह को छोड़कर कुल पर्वतों के समान पृथ्वी का उद्धार करने वाले हैं जो समुद्र के समान स्वयम धन की इच्छा से रहित होकर रत्नों के स्वामी हैं। ऐसे अपूर्व गुणों को धारक पुरातन पूर्वाचार्यों के समान उनके गुणों का अनुकरण करने वाले महान आचार्य परमेष्ठी हैं।

गुरु दक्षिणा

एक प्रश्न आया कि हम गुरु को क्या दे सकते हैं? हमने गुरु के गुण देखे अब श्रावकों का भी कर्तव्य बनता हैं कि आप अपने अवगुण का त्याग करे गुरु के समक्ष शक्ति अनुसार नियम लेवे । जैन धर्म में चार प्रकार के दान बताए गए हैं आप सभी साधुओं को आहार दान ,अभय दान अर्थात आहार विहार निहार के समय गुरु की सेवा सुरक्षा वेय्यावृति करे। औषधि दान ,ज्ञान दान शास्त्र दान ,संयम के उपकरण पीछी कमंडल वस्त्र आदि दे सकते हैं गुरु की भक्ति पूजन करे आदि अनेक प्रकार से सेवा की जा सकती है। साधु तीर्थ स्वरूप है तीर्थ दर्शन तो कालांतर में फलदाई होता है किंतु साधु दर्शन से तत्काल ही फल मिलता है इसी उक्ति के अनुसार मेरे मन में साधु समागम की उत्कृष्ट भावना घर कर गई और परम शांत वात्सल्यमूर्ति ऋषिराज का दर्शन ही निर्मल दृष्टि का कारण बना इन्ही विचारो ने मन को प्रेरित किया कि अनादि काल से संसार के दुःखो से संतृप्त मुझ को इन गुरुदेव की भक्ति और इनके चरण सानिध्य में ही संसार समुद्र से पार होने का उपाय प्राप्त हो सकता है अतः मेने निर्णय लिया कि अब इन परम गंभीर एवम शांत गुरुवर की सन्निधि में ही अपना जीवन व्यतीत करना है

श्री शांति सिंधु सी निर्भयताहो वीर सिंधु सी निर्मलताशिव सागर सा अनुशासन हो हो धर्म सिंधु सी निस्पर्हता संयत वाणी चिंतन शक्ति होअजित सुरिवर सी दृढ़ता इन। सर्व गुणों का संचय हो वृद्धि गत हो मन की मृदुता हो मार्ग आपका निष्कंटक यशवती बने यह परम्परा।

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